बिछड़ के दूर तुमसे मैं कभी जो जाऊंगा
करूंगा याद तुमको और याद आऊंगा
ओठ खामोश ही रह जाएंगे भले लेकिन
बनके धड़कन सदा ही दिल में गुनगुनाऊंगा
एक एक बात मेरी याद जब भी आएगी
भाव में डूब कर के पलक को भिगाऊंगा
तन की ये दूरी भले तुमसे बन गई होगी
मगर मैं मन से तेरे पास में ही आऊंगा
अपनी दुनिया में मुझको आज तो शामिल कर लो
बन के जीवन तेरे जीवन को भी महकाऊंगा
झूमकर छाएगा सावन कभी जो आंखों में
भाव में डूब करके अश्रू को बहाऊंगा
कभी ना छाएगा अंधेरा तेरे जीवन में
सदा ही प्रेम का एक दीप मै जलाऊंगा
मैं जानता हूं कटीली है आज की दुनिया
उन्हीं कांटो के बीच गुल नया खिलाऊंगा
जिंदगी होती सदा से ही खेल कुदरत की
सदा रहा न कोई कैसे मै रह पाऊंगा
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


