तेरे रंग रूप में रोज ढलता रहा
मन की आंखों से दिल में उतरता रहा
सुर्ख चेहरे पर बिखरी जो जुल्फे कभी
चांद का पहरा उसको समझता रहा
जब सुना तेरे पायल की झंकार तो
रोज नगमे नए गुनगुनाता रहा
पा न पाया था जब तक मैं तुझको यहां
तेरी तस्वीर दिल में बनाता रहा
उंगलिया जब उठी थी हमारी तरफ
नग अंगूठी से उगली सजाता रहा
जब नजर थी झुकी ओठ कपन हुआ
भाव मे डूब दिल मुस्कुराता रहा
जाने कब से ये रिश्ते हमारे रहे
तुम नदी और हम तो किनारे रहे
जन्मो जन्मो का चलता रहा सिलसिला
तुम हमारे रहे हम तुम्हारे रहे
ऐसे वैसे बने कैसे-कैसे यहां
रिश्ते खुद से ही खुद को मिलाते रहे
पालू खुशियों का सागर जो दिल का यहां
मन तरंगों में ही डूबते हम रहे
बंद ना हो कभी द्वार दिल का तेरा
मन की खिड़की सदा खोलते हम रहे
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


