हजारों रंग फीके हैं प्रेम रंग सब पे भारी है
है फीकी इत्र की खुशबू, खुशबू रिश्तो की भारी है
हमारा सारा जीवन ही भले रंगीन हो जाए
भरी जो सादगी दिल में ओ हर रंगों पे भारी है
तल्ख लहजों से बातें आज तेरी दब भले जाए
मगर इन तेज बातों पर सदा ही मौन भारी है
लाघ जाए तू सागर या की लाघे जो खड़े पर्वत
कर्म और प्रेम भावो को लाघना सबपे भारी है
पढ़ी हो चाहे जितनी ही किताबें तुमने जीवन में
किताबें जो पढी है कर्म की वो सब पे भारी है
समझ जाओ भले ही विश्व की हर एक भाषा को
मगर दिल भाव की भाषा समझना सब पे भारी है
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


