है प्रकृति आवरण जिंदगी की यहां
बात सच है इसे भूलो मत तुम कभी
इस प्रकृति से ही सबका है जीवन बचा
भूल कर भी इसे छेड़ो मत तुम कभी
सारा जीवन धधकता ही रह जाएगा
गर प्रकृति रूठ जाएगी तुमसे कहीं
तेरी सांसे ये बसती प्रकृति में सदा
सांसो की डोरी ना टूट जाए कहीं
इस प्रकृति को बना दे तू उपवन सदा
ध्यान रखो ना ये सूख जाए कहीं
इस प्रकृति पर ही तेरा है जीवन टिका
आओ वृक्षों को हम सब लगाएं अभी
आज ऐसे मिलाए प्रकृति से कदम
इसका बिगड़े ना संतुलन फिर कभी
ये वही वृक्ष हैजिनकी शाखाओं पर
कोयले गीत हमको सुनाती कभी
कितने पशु पक्षी का है बसेरा यहां
काट जंगल को वीरान ना बनाओ कभी
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


