मिलाकर नैनो से नैना
करो बातें तो हम जाने
ना हो ओठो पे कंपन
मौन दो उत्तर तो हम जाने
समझ कर मन की पीड़ा को
बहावो प्रेम की नदियां
भरा दिल प्रेम का सागर
जो छलकाओ तो हम जाने
अंधेरा घर बनाकर छिप रहा है
दिल के कोने में
जला दिल दीप दिवाली
मनाओ फिर तो हम जाने
कभी खिलकरके आ जाओ
ह्रदय के गर बगीचे में
कली बनकरके खुशियों को
जो महकाओ तो हम जाने
भिगाकर तन वदन पूरा
प्रेम भावो के सागर में
प्रेम झोको के संग बारिश
कराओ तो कभी जाने
धधकता है कभी जो दिल
बिरह की अग्नि में तपकर
चांदनी रात शीतल सी
बनाओ तो कभी जाने
भरी खुशबू हो तपती रेत पर
खिलते जो पुष्पों से
नया एक रंग देकर के
खिलाओ तो कभी जाने
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


