गर तेरा भाव मेरे भावो में डूबा होता
माधुरी रात बनके दिल में उजाला होता
कभी ना देखता मैं आसमां के चंदा को
दिल में चेहरा तेरा गर चांद सा उतरा होता
कौध जाती ये बिजली दिल में मेरे रातों को
तेरा उरोज घटा बनके जो उभरा होता
बैठी रहती तू मेरे दिल में समा कर ऐसे
जैसे फूलों के बीच खुशबू का डेरा होता
सदा ही उगता मेरे भावो का पौधा ऐसा
जैसे जल में ही सदा पुष्प कमल हो खिलता
सदा ना देखता मैं तुझको रात ख्वाबों में
बनके हमराज मेरे साथ जो खड़ा होता
अंधेरा घना दिल से मेरे तब तो छठ जाता
प्रभात सूर्य सा तू बनके जो उगा होता
अगर न आती सजके रात मेरे ख्वाबों की
भुने पापड़ के जैसे दिल न ये टूटा होता
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


