गुजारा है अकेला पन तुम्हारे दूर रहने से
मगर तू ना समझ पाए तेरी कितनी जरूरत है
मैं जीवन जी के भी जीवन सा जीवन जी नही पाया
भरा पूरा मगर परिवार लगता सूना सूना है
हंसे सब लोग मिलकर के मगर ए दिल ना हंस पाया
तुमसे दूर हो करके अब तो खाली दिल ये रोया है
बीतता है ये पूरा दिन खुद अपने दिल को समझाते
मगर दिल मेरा ऐसा है कि कुछ भी ना समझता है
दिलों का हाल अपने जब किसी को हम सुनाते हैं
दिलों पर हाथ रख पत्थर भी आंसू को बहाते है
निकलता है ये आंसू जब कभी भी आंख से होकर
इन्हीं आंखों के जल से झील भी पानी बहाते है
न जाने कौन से कोने में जाकर छुप गए हो तुम
मुझे अब ना मिलोगे तुम जमाने भर ये लगता है
दब जाती है इच्छा जब कभी भी दिल के आंगन में
पनप कर प्यार दिल में ही सदा मेरे धड़कता है
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


