जीवन पुष्पों की पंखुड़ी जैसी नहीं होती,
यंत्रणा देने वाली कांटे, चुभती रहती है।
मृत्यु की सेज में जो जाना भी चाहों,
न जाने क्यों, ज़िंदगी और लंबी होने लग जाती।
इम्तिहान कई अभी और है बाकी,
अभी कई किले फतह करना है।
कांटों के नोख चाहे चुभे,
चाहे जख्म जितने गहरे दें।
अभी उम्मीद ए ज़िंदगी की रोशनी को ओढ़े रहना है।।
रचनाकार
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जगन्नाथ पूरी, ओड़िशा, Copyright@पूनम गूँजा/इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


