आज महफिल दिलों की सजा लीजिए
अपने दिल की उदासी मिटा दीजिए
कोई गम ना रहे अब किसी बात का
आज जी भर के तुम मुस्कुरा लीजिए
कोई साथी मिला ना तो गम न करो
मुझको ही अपना साथी बना लीजिए
क्यों भटकता रहा आज तक दरबदर
मेरे दिल में ठिकाना बना लीजिए
कब तलक ऐसे गुमसुम से बैठोगे तुम
हंस के चेहरे की रौनक बढ़ा दीजिए
ये निराशा जो मन में है तेरे भरी
आशा के दीप से जगमगा दीजिए
तुमको देखा तो नजरे ये कहने लगी
आज कोई चमन में नया गुल खिला
प्रेम को ही बसा कर के दिल में सदा
नफरतो की घटाएं घटा दीजिए
आज काली घटा का है पहरा पड़ा
चांद मुखड़े का अपने दिखा दीजिए
देख लूं तेरा रोशन सा चेहरा अभी
फिर तो चिलमन को चाहे गिरा लीजिए
तेरे चेहरे पे कोई शिकन ना रहे
अपने मन से ही तू फैसला लीजिए
कोई शिकवा गिला या शिकायत नहीं
चाहे जिसको तू अपना बना लीजिए
आज महफिल दिलों की तो फिर सज गई
अपने दिल की उदासी मिटा दीजिए
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


