हरिजन

हरिजन वही है जिसे
हरि ने जना हो मित्र ।
बातें विचित्र कर
चित्त ना बिगारिए ।।

धर्म की ध्वजा के
वाहक सभी हैं यहाँ ।
निज हृद स्थल से
संसय ये टारिए।।

देखी नहीं जात रघुनाथ
भ्रात शबरी की ।
कुबरी की बेर
श्री कृष्ण को निहारिए ।।

मूढता के सागर दिन रैन
आप पैर रहे ।
छोड़ कर बैर
शीश राम पैर डारिए ।।

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रचनाकार

Author

  • राम सहारे मिश्र

    श्री राम जानकी मंदिर, पुरानी दाल मंडी केसा के सामने, केनाल रोड कानपुर,Copyright@राम सहारे मिश्र/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |

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