सुनता रहा मैं

सुनता रहा मैं उसकी बोला न ताव में,
हर मोड़ पर रहा मैं उसके प्रभाव में।
फिर भी मिली है मुझको दर्दे जुदाइयां,
जाने वही क्या चल रहा उसके स्वभाव में।
महसूस हो रहा मैं डूबा ही जा रहा हूँ,
अब भर रहा है पानी मेरी ही नाव में।
कुछ आरज़ू नहीं है उस बेवफा से मुझको,
सीखा है हमने जब से रहना अभाव में।।

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रचनाकार

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  • बजरंगी लाल

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