अब तो चेहरे पर आफताब नहीं दिखता है
सुर्ख गालों पर अब गुलाब नहीं दिखता है
मन की कुंठा में ही सब लोग सने बैठे हैं
सब में भर जाए प्रेम भाव नहीं दिखता है
सदा ही सुर्खियों में अब सभी रहना चाहे
दिलों में रहने का जज्बात नहीं दिखता है
पानी भी अब तो यहा खून से महंगा हुआ
भरा है जोश सबमें सब्र नहीं दिखता है
भाव शीतल हो जाए प्रेम ही फले फूले
फूल खिलता न दिल बंजर सा ही दिखता है
अहम भरा हुआ है अब तो सबके जेहन मे
भरा उजाला दिल में अब तो नहीं दिखता है
भटक रहे हैं अब तो नौजवान पीकर के
चले किस राह पर ओ राह नहीं दिखता है
हमारी जिंदगी में अब उजाला कैसे हो
दूर तक सोचने की क्षमता नहीं दिखता है
हवा भी ऐसी चली कि शबाब धन का बड़ा
मिला है धन बहुत सुकून नहीं मिलता है
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


