शिक्षक समाज का शिल्पकार

शिक्षक से हम शिक्षा प्राप्त करते हैं। शिक्षक वह व्यक्ति है जो हमें जीवन में उपयोग में आने वाली हर चीज़ें सिखाता है। इसमें किताबी ज्ञान से लेकर व्यावहारिक ज्ञान, हमारे त्योहारों, रीति-रिवाजों तथा परंपराओं तक का ज्ञान शामिल होता है। शिक्षक अपने ज्ञान रूपी प्रकाश से अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाता है।
पथ तो प्रकाश का है,
लक्ष्य अज्ञान के विनाश का है,
सब पढ़ें, सब बढ़े,
के विश्वास का है।

भारत में माह सितंबर शिक्षक समुदाय के लिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि प्रत्येक वर्ष भारत के पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस यानी 5 सितंबर को ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। विश्व के अलग-अलग देशों में अलग-अलग तारीखों पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है। जैसे- ओमान, सीरिया, मिश्र, लीबिया, कतर, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, यमन, टुनिशिया, जार्डन, सउदी अरब, अल्जीरिया, मोरक्को और अन्य इस्लामी देशों में 28 फरवरी को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। अर्जेन्टीना-11 सितम्बर, अल्बानिया-7 मार्च, ऑस्ट्रेलिया-अक्टूबर मास का अंतिम शुक्रवार, ब्राज़ील- 5 अक्टूबर, चिली- 16 अक्टूबर, चीन- 10 सितम्बर, चेक गणराज्य-28 मार्च, इक्वाडोर- 13 अप्रैल, अल साल्वाडोर- 22 जून, हांगकांग- 12 सितम्बर, हंगरी- जून का पहला शनिवार, इंडोनेशिया- 25 नवम्बर, ईरान-2 मई, मलेशिया- 16 मई, मेक्सिको- 15 मई, मंगोलिया- फ़रवरी का पहला सप्ताहांत, पाकिस्तान-5 अक्टूबर, पेरू- 6 जुलाई, फ़िलीपीन्स- 5 अक्टूबर आदि। सन् 1994 से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह 5 अक्टूबर को मनाया जाता है। इसी बात से शिक्षक की महानता एवं महत्व का पता चलता है।

शिक्षक की विद्यालय में भूमिका डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन् ने लिखा है कि “समाज में अध्यापक का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। वह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को बौद्धिक परंपरायें तथा तकनीकी कौशल पहुँचाने का केन्द्र है एवं सभ्यता के प्रकाश को प्रज्ज्वलित रखने में सहायता देता है।” एक सच्चा अध्यापक जीवन-पर्यन्त विद्यार्थी बना रहता है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर के शब्दों में- “एक अध्यापक कभी भी वास्तविक अर्थों में नहीं पढ़ा सकता, जब तक वह स्वयं अभी सीख न रहा हो। एक दीपक दूसरे दीपक को कभी भी प्रज्ज्वलित नहीं कर सकता जब तक कि उसकी अपनी ज्योति जलती न रहे।” शिक्षा संस्कृति के हस्तांतरण, संरक्षण तथा संवर्धन का प्रमुख साधन है। शिक्षा की प्रक्रिया में अध्यापक एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी है। शिक्षक को छात्र के अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाने वाला एक ज्ञानरूपी प्रकाश दिखाकर मानवता के पथ को आलोकित करने वाला कहा गया है। कोठारी कमीशन (1964-66) ने भी अध्यापकों को राष्ट्र-निर्माता की संज्ञा दी है। एक शिक्षक, सामान्य सामाजिक व्यक्ति से अधिक चरित्रवान, उदार, सहिष्णु, दयालु एवं मर्यादित होता है। “शिक्षक पर्व मनाने के पीछे का विचार युवा दिमाग और राष्ट्र निर्माण में शिक्षक की भूमिका तथा शिक्षण पेशे की गरिमा और शिक्षकों के योगदान को स्वीकार करना है।” किसी भी समाज के निर्माण में शिक्षक की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण होती है जैसा कि चाणक्य ने स्पष्ट कहा है “शिक्षक कभी साधारण नहीं होता, प्रलय और निर्माण उसकी गोद में पलते हैं।”

शिक्षक का स्थान समाज में हमेशा से ही पूज्यनीय रहा है। कोई उसे ‘गुरु’ कहता है, कोई ‘शिक्षक’ कहता है, कोई ‘आचार्य’ कहता है, तो कोई ‘अध्यापक’ या ‘टीचर’ कहता है। ये सभी शब्द एक ऐसे व्यक्ति को चित्रित करते हैं, जो सभी को ज्ञान देता है, सिखाता है और जिसका योगदान किसी भी देश या राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करना है।
सही मायनों में कहा जाए तो एक शिक्षक ही अपने विद्यार्थी का जीवन गढ़ता है और शिक्षक ही समाज की आधारशिला है। एक शिक्षक अपने जीवन के अंत तक मार्गदर्शक की भूमिका अदा करता है और समाज को राह दिखाता रहता है, तभी शिक्षक को समाज में उच्च स्थान दिया जाता है। माता-पिता बच्चे को जन्म देते हैं। उनका स्थान कोई नहीं ले सकता, उनका कर्ज हम किसी भी रूप में नहीं उतार सकते, लेकिन एक शिक्षक ही है जिसे हमारी भारतीय संस्कृति में माता-पिता के बराबर दर्जा दिया जाता है, क्योंकि शिक्षक ही हमें समाज में रहने योग्य बनाता है इसलिए ही शिक्षक को ‘समाज का शिल्पकार’ कहा जाता है।
गुरू ब्रह्मा गुरू विष्णु, गुरु देवो महेश्वरा
गुरु साक्षात परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नम: अर्थात गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं। इन शब्दों को समझने के लिए गुरुकुल युग में प्रवेश करना होगा। समय परिवर्तन होने के बाद गुरु शब्द को बोलने का नजरिया और गुरुओं के प्रति भावना में परिवर्तन भी हो गया। राष्ट्र निर्माण में समर्पित गुरुओं ने राष्ट्र के विकास में अहम योगदान दिया है।

किसी भी राष्ट्र का आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास उस देश की शिक्षा और शिक्षक पर निर्भर करता है। भारतीय समाज में विविधताएँ हैं इसलिए भारतीय समाज और संस्कृति को समझने के लिए एक अंतर्दृष्टि की आवश्यकता पड़ती है। भारत के शैक्षणिक इतिहास को जानने के लिए इसके सांस्कृतिक प्रवाह को समझना होगा क्योंकि शिक्षा और समाज का शाश्वत संबंध रहा है। सभ्यता की शुरुआत से ही धर्म-दर्शन तथा शिक्षा भारतीय समाज का आधार रहा है। वैदिक काल से ही भारत शैक्षणिक स्तर पर समृद्ध रहा है। वेदों में शिक्षकों के गुण एवं कर्त्तव्य, शिष्य के गुण तथा कर्त्तव्य, शिक्षक और शिष्य का संबंध, शिक्षा की विधि, शिक्षण की विधि, शिक्षा सत्र तथा शिक्षा के विषय आदि पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। वैदिक काल से उपनिवेशीकरण के पूर्व तक भारत में अनौपचारिक शिक्षा प्रणाली प्रचलित रही है। गुरुकुल आधारित शिक्षा प्रणाली भारतीय परंपरा का प्रमुख अंग है। नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना तथा इसके प्रभाव से भारतीय शिक्षा व्यवस्था की समृद्ध परंपरा को जाना जा सकता है। बौद्ध और जैन धर्म ने परंपरागत भारतीय शिक्षा प्रणाली में बदलाव किया, लेकिन यह स्पष्ट है कि प्राचीन शिक्षा प्रणाली धर्म और दर्शन पर आधारित थी। उपनिवेशवाद के दौर में भारत में औपचारिक शिक्षा प्रणाली की शुरुआत हुई। भारत में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना इसी ब्रिटिश प्रणाली के अनुरूप हुई। ब्रिटिश काल के दौरान विभिन्न प्रकार के आयोगों ने पूरे औपनिवेशिक काल में भारतीय शिक्षा प्रणाली की नींव रखी, जिसमें मैकाले मिनट, वुड डिस्पैच, सैडलर आयोग और 1904 की भारतीय शिक्षा नीति शामिल है। ब्रिटिश काल में शिक्षा प्रणाली की संरचना ब्रिटिश शासन के हितों को साधने वाली थी। 1835 में मैकाले के कथन से ही ब्रिटिश शिक्षा नीति का औपनिवेशिक चरित्र स्पष्ट होता है। उसने कहा, “हमें एक ऐसा वर्ग पैदा करना चाहिए जो हमारे और करोड़ों लोगों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, दुभाषिये (interpreter) का काम कर सके- ऐसे व्यक्तियों का वर्ग जो रंग और रक्त से भारतीय हो, किन्तु रुचियों, विचारों, नैतिकता और बुद्धि में अंग्रेज़ हो।”

स्वतंत्र भारत ने सभी स्तरों पर शिक्षा में बहुआयामी विकास किया लेकिन गुणात्मक विकास की बजाय परिमाणात्मक विकास ज्यादा हुआ। शिक्षा का स्वरूप आमतौर पर उपनिवेशवादी ही रहा। यदि वर्तमान में हम पुनर्विलोकन करें तो इसमें क्रमिक रूप से बदलाव देखने को मिलता है। स्वतंत्रता के पश्चात 1948-49 में राधाकृष्णन ने विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग (यूजीसी) का गठन किया। इसने स्वतंत्र भारत की शिक्षा प्रणाली को एक संप्रभु राष्ट्र की जरूरतों और आकांक्षाओं के अनुकूल बनाने पर जोर दिया। शिक्षक समाज में उच्च आदर्श स्थापित करने वाला व्यक्तित्व होता है। किसी भी देश या समाज के निर्माण में शिक्षा की अहम् भूमिका होती है। कहा जाए तो शिक्षक ही समाज का आईना होता है।
हिन्दू धर्म में शिक्षक के लिए कहा गया है कि ‘आचार्य देवो भव:’ यानी कि शिक्षक या आचार्य ईश्वर के समान होता है। यह दर्जा एक शिक्षक को उसके द्वारा समाज में दिए गए योगदानों के बदले स्वरूप दिया जाता है। नई शिक्षा नीति 2020 (New Education Policy 2020) / राष्ट्रीय शिक्षा नीति 29 जुलाई 2020 लागू हुई है जिसका उद्देश्य शिक्षा के स्तर में सुधार करना और भारत को एक विकसित राष्ट्र बनना है।

गुरु या शिक्षक का संबंध केवल विद्यार्थी को शिक्षा देने से ही नहीं होता बल्कि वह अपने विद्यार्थी को हर मोड़ पर उसको राह दिखाता है और उसका हाथ थामने के लिए हमेशा तैयार रहता है। विद्यार्थी के मन में उमड़े हर सवाल का जवाब देता है और विद्यार्थी को सही सुझाव देता है और जीवन में आगे बढ़ने के लिए सदा प्रेरित करता है। विश्व में केवल भारत ही ऐसा देश है जहाँ पर शिक्षक अपने शिक्षार्थी को ज्ञान देने के साथ-साथ नैतिकतायुक्त एवं गुणवत्तायुक्त शिक्षा भी देते हैं, जोकि एक विद्यार्थी में उच्च मूल्य स्थापित करने में बहुत उपयोगी है।
वर्तमान युग आधुनिकता का, वैज्ञानिकता का, तीव्र भौतिककता का, व्यस्तता का, अस्थिरता का, जल्दबाजी का है। आज का विद्यार्थी जीवन भी इन्ही समस्याओं से ग्रसित है। आज का विद्यार्थी जीवन पहले की तरह सहज, शांत और धैर्यवान नहीं रह गया है। क्योंकि आगे बढ़ना और तेजी से बढ़ना उसकी नियति, मजबूरी बन गई है। वह इसलिए कि यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो ज़िंदगी की दौड़ में वह पीछे रह जायगा। तो यह वक्त का तकाजा है। ऐसे समय में विद्यार्थी जीवन को एक सही, उचित, कल्याणकारी एवं दूरदर्शी दिशा निर्देश देना एक शिक्षक का पावन कर्तव्य है। वैसे तो शिक्षक की भूमिका सदैव ही अग्रगणी रही है। एक राष्ट्र को बनाने में एक शिक्षक का जितना सहयोग है, योगदान है, उतना शायद किसी और का हो ही नहीं सकता। क्योंकि एक राष्ट्र को उन्नति के चरम शिखर पर ले जाते हैं उसके राजनेता, वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, उद्योगपति, लेखक, अभिनेता, खिलाड़ी आदि और इन सबको बनाने वाला एक शिक्षक ही तो होता है।

वर्तमान समय में विद्यार्थियों के संदर्भ में एक शिक्षक की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है। आज के इस वैज्ञानिक, कम्प्यूटर तथा इंटरनेट के दौर में विद्यार्थी बहुत ही सजग, कुशाग्र एवं कुशल होने के साथ-साथ बहुत अस्थिर और अविश्वासी भी होते जा रहे हैं। इसके कारण चाहे जो कुछ भी हो परंतु एक शिक्षक को आज के ऐसे ही विद्यार्थियों को उचित प्रशिक्षण, सदुपयोगी शिक्षण और सटीक कल्याणकारी, दूरगामी मार्गदर्शन प्रदान करते हुए उन्हें भावी देश के कर्णधार, जिम्मेदार देशभक्त नागरिकों में परिणित करना है। वर्तमान में एक शिक्षक की जिम्मेदारी बहुत अधिक बढ़ गई है क्योंकि उसे ना केवल बच्चों का बौद्धिक, नैतिक, मनोवैज्ञानिक ,शारीरिक विकास करना है अपितु सामाजिक, चारित्रिक, एवं सांवेगिक विकास करना भी आज शिक्षक का ही कर्तव्य है। शिक्षक को अधिक से अधिक बच्चों के साथ इंटरेक्शन (Interaction) यानि वार्तालाप करना चाहिए ताकि उनके व्यक्तित्व पर यथासंभव अपना प्रभाव डाल सके। अपने अनुभव, अपनी शिक्षा, अपने प्रेम, समर्पण अपनी सृजन शक्ति, अपने त्याग, अपने धैर्य आदि का पूर्ण प्रदर्शन करते हुए बच्चों के भी अनुभव, उनके मूल विचार, उनकी भावनाओं आदि को जानने का प्रयास करें और यथासंभव उन्हें अभिप्रेरित करने का प्रयास करें। क्योंकि इन्ही सब विद्यार्थियों में से ही भविष्य में हमारे देश का नाम रोशन करने वाले कई नागरिक पैदा होंगे। एक आदर्श शिक्षक का कार्य बहुत ही महत्वपूर्ण है। एक बात और कि जिस प्रकार शिक्षा एक अंतहीन प्रक्रिया है, उसी प्रकार शिक्षण भी अंतहीन प्रक्रिया है।

शिक्षण सबसे महान और निस्वार्थ व्यवसायों में से एक है। शिक्षक अपने छात्रों को बेहतर इंसान और महान शिक्षार्थी बनाने के लिए कई रचनात्मक और नवीन विधियों के माध्यम से सर्वोत्तम व्यावहारिक और नैतिक ज्ञान प्रदान करने का प्रयास करते हैं। जबकि शैक्षिक उद्धरण आपको महान व्यक्तित्वों से कुछ बुद्धिमान सबक प्रदान करते हैं, हर किसी के जीवन में एक नायक या कई सलाहकार होते हैं जिन्हें वे देखते हैं। ये शिक्षक केवल वे नहीं हैं जिनसे आप अपनी शैक्षणिक यात्रा में मिलते हैं, बल्कि जीवन भर, चाहे वह आपके बुजुर्ग हों या वे जिन्होंने आपको जीवन में महत्वपूर्ण ज्ञान प्रदान किया।

अंत में मैं यही कहना चाहता हूँ कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए एक सजग, चरित्रवान, अध्यात्मिक, नैतिकता परिपूर्ण शिक्षक की आवश्यकता है ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी को हम ऐसे आदर्श भारतीय नागरिक बनाने में सफल हो सकें जो विश्व में भारत का नाम उंचा और रोशन कर सकें। शिक्षकों की भूमिका न केवल छात्रों को शिक्षित करने में होती है बल्कि वे छात्रों को सही और गलत के बीच अंतर को समझाने और संवेदनशील नागरिकों के रूप में उन्हें तैयार करने के लिए भी जिम्मेदार होते हैं। इसके लिए शिक्षकों को छात्रों को संबोधित करने और उनकी भावनाओं को समझने के लिए उचित सामाजिक और मनोवैज्ञानिक ज्ञान होना जरूरी हैं। एक आदर्श शिक्षक तो सदैव बिना किसी लालच के, बिना कहे अपना सर्वस्व ज्ञान अनुभव में डुबोकर प्रदान करने के लिए हमेशा समाज के सामने तत्पर रहता है। वास्तव में एक शिक्षक की वर्तमान संदर्भ में भूमिका यह है कि जो एक विद्यार्थी के लिए उचित हो, कल्याणकारी हो, दूरगामी हो, प्रायोगिक हो, धनोपार्जन में सहायक हो ऐसी शिक्षा को निरंतर प्रदान करते रहना चाहिए। कोई शिक्षक हजारों बार अपनी कक्षा में पहुंचा था, तब जाकर आज चन्द्रयान-3 अपनी कक्षा में पहुंचा है।

1- के.सी. श्रीवास्तव- प्राचीन भारत का इतिहास एवं संस्कृति
2 – डॉ राधेश्याम द्विवेदी- भारतीय संस्कृति
3 – प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति- डी.डी. कोसांबी
4 – आधुनिक भारत- सुमित सरकार
5 – प्राचीन भारत- राधा कुमुद मुखर्जी
6 – सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति- श्री आनंदमूर्ति
7 – भारतीय मूल्य एवं सभ्यता तथा संस्कृति- स्वामी अवधेशानंद गिरी (प्रवचन)
8 – इंटरनेट साइट्स

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रचनाकार

Author

  • डॉ प्रदीप कुमार सिंह

    असिस्टेंट प्रोफेसर-प्राचीन इतिहास.मऊ-उत्तर प्रदेश. Copyright@डॉ प्रदीप कुमार सिंह/इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |

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