वक़्त ए रुख़सत ये सिलसिला होगा

वक़्त ए रुख़सत ये सिलसिला होगा,

तुझसे दिल खोल कर गिला होगा

बेवफ़ा हो गया है शायद वो,

मुझसे बेहतर कोई मिला होगा,

एक मानूस सी महक है यहां,

उसके छूने पे गुल खिला होगा।

अपने ख़्वाबों का आशियां एक दिन,

दो नहीं चार मंज़िला होगा।

“मन्तशा” एक् ऐसी ख़ुशबू है

तू भी उससे कहीं मिला होगा

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रचनाकार

Author

  • मन्तशा "आरजू"

    मन्तशा "आरजू" बांदा, यूपी, Owner :- Dreams Of Life Foundation Copyright@मन्तशा (शायरा)/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |

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