मैं ही इस जग रचयिता हूं

मैं ही इस जग रचयिता हूं,

मैं पालनकर्ता भी कहलाता हूं ।

मैं ही परमब्रह्म,परमेश्वर,

कण कण में नजर मैं आता हूं ।।

मैं धरा से पाप मिटाता हूं,

मैं संघारक भी कहलाता हूं ।

मैं ही सृजन,मैं हूं प्रलय,

मैं ही ये पवन, चलाता हूं ।।

स्वांस_स्वांस में, बास है मेरा,

सबसे ही प्रेम जताता हूं ।

अधर्म जब_जब बढ़ जाता है,

तब_तब मैं उसे मिटाता हूं ।।

मैं पुष्पों को महकाता हूं,

सबको मैं मार्ग दिखाता हूं ।

दिनकर,चंद्र,नक्षत्र, सभी,

उंगली पर अपनी नाचता हूं ।।

मुझमें में है शिव ब्रह्मा विष्णु,

मैं अविनाशी भी कहलाता हूं ।

मैं करता हूं,दिन_रात सभी,

मैं ये सृष्टि चक्र,चलाता हूं ।।

मैं ही देवकी के गर्भ से जन्मा,

मैं यसुदा घर माखन खाता हूं ।

इंद्र में जब अभिमान जगा था,

तब गोवर्धन को, मैं ही उठता हूं।।

कंस के अत्याचारों से

ये धरणी बड़ी अकुलाई थी ।

कर के अंत उस पापी का,

जग की पीर मिटाई थी ।।

इसलिए सारे विश्व का,

मैं जगत पिता कहलाता हूं ।।

अब उठो पार्थ मोह को त्यागो,

गांडीव की प्रत्यंचा तानो ।

क्षत्रिय का कर्म युद्ध करना,

खुद को भी जरा तुम पहचानो ।।

तुम चलते जाओ मेरे संग संग,

मैं तुमको मैं मार्ग दिखाता हूं ।।

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रचनाकार

Author

  • अनूप अंबर

    नाम : अनूप अंबर जन्म तिथि:01जनवरी 1991 पिता का नाम:राजेश कुमार पता: फर्रुखाबाद उत्तर प्रदेशइनके नौ साझा संकलन प्रकाशित हो चुके हैं, पच्चीस अर्थलोगी प्रकाशित हो चुकी है, विभिन्न मंचों से 150 से अधिक सम्मान पत्र प्राप्त है, इनकी विभिन्न रचनाएं पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है,ये कई साहित्य पटलों पर सक्रिय है ।। Copyright@अनूप अंबर / इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |

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