बँटवारा

गर्मी का मौसम था। सुबह की ठंडी- ठंडी हवा रात की भीषण गर्मी से परेशान लोगों को अपने शीतल स्पर्श से मानो थपकियां लगा -लगा कर सुला रही थी।

पक्षियों के चहचहाने से आंख खुली तो मैंने देखा कि लाल काकी भारी मन से सूखी टहनी की तरह अपने बेजान हाथों से ईद गिर्द पड़े सामानों को टटोल टटोलकर गठरी बांध रही थी।

महीने का पहला दिन लाल काकी के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं होता था, एक बेटे के घर से दूसरे बेटे का घर जो जाना पड़ता था। थक चुकी थी यहां वहां करते करते। झुकी हुई कमर लाठी के सहारे चलने वाली अस्सी साल की बूढ़ी हड्डियों में अब इतनी ताकत कहां थी जो खुद अपना सामान उठाकर यहां वहां करती फिरे। पर करें भी तो क्या , बेटे बहूओं में एक दूसरे के प्रति इतना बैरभाव था कि मां का सामान लाने के लिए भी भाई को भाई के घर जाना पसंद नहीं था।

कहने के लिए तो लाल काकी सात-सात बेटों की मां थी। कितना गुमान था कभी अपने सातों बेटों पर। जब लालकाका जिंदा थे तो धरती पर पैर नहीं टिकने देती थी। कितना घमंड था सौ बीघे की जमीनदारी और सात-सात बेटों पर। अपने पहलवान जैसे बेटों को देखकर दोनों फूले नहीं समाते थे। अड़ोस पड़ोस से झगड़ा होने पर महाभारत के दुर्योधन की तरह ललकारने लगते थे, सात- सात महारथी जो लाठी लेकर पीठ पर खड़े रहते थे। सब चुप हो जाते थे, एकदम चुप। चुपचाप खा लेते थे अन्याय और अत्याचार के लाठियों की मार।

गांव भर में किसी में भी इतनी हिम्मत कहां थी जो न्याय अन्याय की बात करे , कौन इन बाघ के बच्चों के मुंह में हाथ डाले ।

जो भी हो सौ बीघे की जमीन दारी खड़ी करने में लाल काकी का भी कम योगदान नहीं था । दस बीघा मारना वाली जमीन खरीदने में अपने सारे गहने बेच दिए थे । सोने का मंग टीका, डेढ़ किलो वाली चांदी की हसुली, डड़कस, चंद्रहार सब के सब बेच डाली थी। ऐसा नहीं था कि गहने बेचते समय आंखो में आंसू ना आए हों पर लाल काका को पता ना चले इसलिए आंसू पीकर हंसते-हंसते सारे गहने उनके आगे लाकर रख दिए। घर की बड़ी बहू होने के नाते दादी ने अपने सारे गाने उसी को दिए थे।

कहते हैं औरत को गहनों से बड़ा लगाव होता है। शादी में भले हीं लड़का उन्नीस -बीस हो पर अच्छे गहने देखकर सब औरतें खुश हो जाती हैं । लड़के वालों की हैसियत का पता भी तो कपड़े और गहने देख कर हीं लगाया जाता है ।

मायके से दी हुई गाय भैंस सब बेच दिए तब जाकर सौ बीघे की जमीनदारी खड़ी की थी ।

अब लालकाका नहीं रहे, सातों भाई सात जगह हो गए । जमीन -जायदाद का बंटवारा हुआ साथ हीं बूढ़ी मां का भी बंटवारा हो गया । एक -एक महीने सबके साथ । तीसरे भाई की पत्नी गुजर चुकी थी , छोटे-छोटे तीन बच्चे थे । दूसरी शादी भी नहीं की थी। जब लाल का की उसकी पारी में जाती तो घर संभालने से लेकर खाना बनाना , बच्चों की देखभाल करना सब इन्हीं को करना पड़ता था निर्दय भाइयों ने उसकी भी पारी में बूढ़ी मां को झोंक दिया कौन एक महीना ज्यादा खिलाता ।

जो लाल का की कभी अपने भाग्य पर इतराती रहती थी वही अब कोसती रहती है अपनी फूटी किस्मत को । जो भी दो मिनट पास आकर बैठता रो – रो के अपना दुखड़ा सुनाने लगती बेटे बहुओं से नजर चुरा – चुरा कर, यदि बहुओं ने सुन लिया तो नागिन की तरह फुफकारने लगती थी… चली क्यों नहीं जाती खिस्सा पिहानी सुनाने बालों के घर… सोने की थाल में दूध भात खिलाकर चांदी के पलने में झूलाएंगे निठल्ले सब… अपने मां-बाप के लिए तो जैसे मंदिर बनवा दिए दूसरे के घर आ जाते हैैं चुगली चपाटी सुनने….।

कौन कीचड़ में ढेला फेकने आते , आना जाना हीं छोड़ दिया सबने। रो -रो के रह जाती बेचारी लाल काकी।

कितना कष्ट सहा होगा सात-सात बच्चों को पालने में पर कभी ऊफ तक नहीं की। हर गम भूल जाती थी अपने बेटों को निहार कर। कितनी मेहनत की थी हवेली जैसा घर बनाने में वह भी नहीं रहा । घर के साथ-साथ सपनों और अरमानों के भी टुकड़े- टुकड़े हो गए। सब मस्त थे अपने अपने बीबी बच्चों के साथ महल से झोपड़ी बने घरों में, एक लाल काकी हीं अभागी की तरफ इधर से उधर गड़कती रहती थी ।

आज फिर वही चिर परिचित महीने की पहली तारीख का मनहूस दिन आ गया । लाल काकी ने किसी तरह अपनी गठरी तो बांध ली पर उसे उठाकर बड़े बेटे के घर से दूसरे के घर तक ले जाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी । गठरी पकड़ कर बैठ गई और बीते दिनों को याद कर फूट-फूट कर रोने लगी । गहरी झील की तरह धसी हुई खाई जैसी आंखों से आंसुओं की धारा फूट पड़ी । जो आंचल कभी सात-सात बच्चों के आंसुओं से गीला नहीं हुआ था वह आज पल भर में गीला हो गया । कितने अरमान थे सात-सात बेटों की मां बन कर । अपनों के बीच रहकर भरा पूरा घर में हंसते-हंसते जिंदगी कट जाएगी पर जिंदगी तो एक पहाड़ बन गई , जिसके घर जाती उसी को एक महीना पहाड़ सा लगने लगता । सात – सात बेटों का पालन पोषण करना एक मां को कभी राई के दाने बराबर भी नहीं लगा लेकिन सातों बेटों को मिलकर एक मां का पालन करना पहाड़ सा लगने लगा ।

धैर्य के सभी बांध टूट गए , बेजान आंखों से आंसुओं की धारा निकल पड़ी सब कुछ बह गया उस प्रचंड प्रवाह में ,नहीं रोक पायी प्रलय कारी प्रवाह को ..।

टूटी हुई हिम्मत और बचे- खुचे साहस को बटोर कर लाल काकी ने एक बार गठरी उठाने की भरपूर कोशिश की पर नहीं उठा पाई कटे हुए पेड़ की तरह लड़खड़ा कर धड़ाम से गिर गई । हाथ की लाठी दूर छिटक गई। बिखरे हुए सफेद बाल डरावने लगने लगे ,मुंह म लीन हो गया । बुझते हुए दीए की लौ की तरह सांसे तेज गति से चलकर फिर शांत हो गई ।

बड़ी बहू चिल्ला – चिल्ला कर सब को बुलाने लगी, सभी दौड़ पड़े जिस आंगन में बरसों से एक दूसरे के पांव नहीं पड़े थे वही आज पूरा परिवार से खचाखच भर गया । सभी सीमा रेखा समाप्त हो गई शायद एक बोझ जो टल गया ।

जब तक लाल काकी जिंदा रही महीने की इस पहली तारीख को कोसती रही पर आज इसी पहली तारीख को अपनी जीवनयात्रा समाप्त कर सब से अलविदा ले ली ।

खुले आसमान की तरफ खुला हुआ मुंह और खुली आंखों से मानो कह रही थी …बेटा ! सब कुछ बांट लेना पर एक मां को कभी मत बांटना…..।।

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रचनाकार

Author

  • अरुण आनंद

    कुर्साकांटा, अररिया, बिहार. Copyright@अरुण आनंद/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |

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