एक दिन पालक ने पूछा ये तो बतलाओ मुझे
कितना मेरा भाव है कुछ तो समझाओ मुझे
गर्मियों में भाव कितना ठंडी में क्या भाव है
खेत में कितना है मेरा घर में कितना भाव है
सज रहे बाजार मे अब मेरा कितना भाव है
जो सवारी जिंदगी है उसका कितना भाव है
कह रहा हूं जो सुनो तुम कहने का यह भाव है
जिसके हैं पालक हमेशा उसका बेड़ा पार है
सज रही बाजार हो या खेत और खलिहान हो
जो भी तेरा भाव है उसका न कोई भाव है
पालक जो घर में रहे तो खुशियों का ही भाव है
है नहीं पालक अगर तो हर जगह अभाव है
पालने में ही ये पालक आज बुड्ढा हो गया
सज गई जो पालकी गमगीन मौसम हो गया
है यहां जितने भी पालक सबका अपना भाव है
भाव में ही डूब कर सब को मेरा प्रणाम है
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


