जीना सीखा है

इक फूल सी बच्ची को मैंने,

कबाड़ उठाते देखा है।

पंखुड़ियों से हाथ हैं जिसके,

खुद का भार उठाते देखा है।।

कोई उसका नही तो

कोई पराया भी नहीं।

संघर्ष भरे इस जीवन में

खुश होकर जीते देखा है..

साथ उसके वहां कोई ना था

ये पल जो मुझको रोके रखा।

खुशी है मेरी ये,

पंक में पंकज खिलते देखा है…

देख रहा था जो उसको मैं

उसने भी मुझको देख लिया,

फिर क्या,

मैंने उसको मुझपे हंसते देखा

सच कहता हूं देख इसे, संघर्ष में जीना सीखा है…

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रचनाकार

Author

  • रंजीत गुप्ता "राही"

    रंजीत गुप्ता "राही" कवि, शायर,ज्ञानार्थी, शिक्षक। प्रतापगढ़,उत्तर प्रदेश। फोन-9170493847 Copyright@रंजीत गुप्ता "राही"/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |

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