जिंदगी ख्वाब है इस ख्वाब में क्यों जीते हो
जिंदगी प्याला गरल का इसे क्यों पीते हो
जितना जीवन में मिला उसको ही पूरा समझो
और पा जाऊं मैं इस चाह में क्यों रहते हो
जलाओ दीप अपने दिल में सदा भावों का
भरे जीवन को खाली करके ही क्यों बैठे हो
प्रकृति विखेर रही है हवा सुगंधित जो
खिलती वादी का क्यों रसपान ना तुम करते हो
भाव में तैरना ही जिंदगी कहलाती है
भाव को छोड़कर के अर्थ मे क्यों बहते हो
सदा ही जीर्ण होता जाता है जीवन सबका
माया नश्वर शरीर क्यों गुमान करते हो
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


