ग़ज़ल:-दुल्हन न बन सकी कभी ख़ुद की निगाह में

दुल्हन न बन सकी कभी ख़ुद की निगाह में
जो भी मिला वो ले गया ख़्वाबों की राह में

छोड़ा है मुझको लाके कहाँ मेरे मेहरबाँ
क्या कुछ कसर न छोड़ी थी मैंने निबाह में

जो दिन की रौशनी में नहीं देखते मुझे
क़दमों को चूमते हैं वही ख़्वाबगाह में

मिटने में मेरे क्या रही अब भी कोई कसर
क्या रहम कुछ नहीं है किसी की निगाह में

ऐ मालिक-ए-नसीब दी कैसी मुझे सज़ा
ऐसी भी क्या ख़ता थी बता मेरी चाह में

यह बात पूछना तो कभी मुझसे पूछना
कितने छुपे हैं दाग़ यहाँ किस कुलाह में

अहसान मुझपे आज मेरी हर ग़ज़ल का है
हर दर्द छुप गया है इसी वाह -वाह में

साग़र हज़ार कोशिशें की फिर भी आजतक
साहिल नज़र न आ सका तूफाँ की राह में

शब्दार्थ:- कुलाह–टोपी ,मुकुट

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