गज़ल

दर्द दुहरा ग़ज़ल में पलता है ,

आपका मन महज़ बहलता है!

रेत आँखों में ख़्वाब गुलशन के ,

ज़िन्दगी की यही सफलता है।

हमको मालूम हद अँधेरे की,

शब के पहलू से दिन निकलता है।

जड़ अगर बदली– सूख जाएगा,

पेड़ बस पत्तियाँ बदलता है।

काँप उठता है दस्तकों से घर,

ख़ौफ दिन-दोपहर टहलता है!

सब यहाँ बादेसबा के साथी ,

कौन झंझा में साथ चलता है?

जिसको सीने से लगाये रहिए,

मूँग छाती पर वही दलता है!

मैंने क्या कम जतन किया होगा,

दिल संभाले कहाँ संभलता है!

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रचनाकार

Author

  • डॉ रवीन्द्र उपाध्याय

    प्राचार्य (से.नि.),हिन्दी विभाग,बी.आर.ए.बिहार विश्वविद्यालय,मुजफ्फरपुर copyright@डॉ रवीन्द्र उपाध्याय इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है| इन रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है|

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