गज़ल-शाख से टूटा है, क्या जाने किधर जायेगा

शाख से टूटा है, क्या जाने किधर जायेगा।

हवा चली है तो कुछ जे़रो ज़बर जायेगा।।

जिगर के खून से हमने लिखे हैं खत इतने,

सुना है, बेच कर रद्दी वो घर बनायेगा।।

बहुत गुरूर था, उसको मुहब्बत पर अपनी,

ना खबर उसको थी कि टूट बिखर जायेगा।।

जलाये घर हैं जिसने, बस्तियां जला डालीं,

सुना है शख्स वही, मेरे शहर आयेगा।।

जा रहे हो तो जाओ, इतना भी ख्याल रहे,

चमन खिला है जो वीरान नज़र आयेगा।।

मेरा रकीब ‘शेष’ है उसूलों का पक्का ,

दीया तुर्बत का बुझाने वो इधर आयेगा।।

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रचनाकार

Author

  • शेषमणि शर्मा 'शेष'

    पिता का नाम- श्री रामनाथ शर्मा, निवास- प्रयागराज, उत्तर प्रदेश। व्यवसाय- शिक्षक, बेसिक शिक्षा परिषद मीरजापुर उत्तर प्रदेश, लेखन विधा- हिन्दी कविता, गज़ल। लोकगीत गायन आकाशवाणी प्रयागराज उत्तर प्रदेश। Copyright@शेषमणि शर्मा 'शेष'/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |

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