गज़ल-अक्सर मुझे आज़माने की खातिर

अक्सर मुझे आज़माने की खातिर।

वो जलता रहा खुद जलाने की खातिर।।

मुहब्बत में आये तो इक बात समझी,

ये आंखें हैं आंसू बहाने की खातिर।।

लुटाकर के सब कुछ ये अंजाम देखा,

मिला न कोई दिल लगाने की खातिर।।

उजाड़े थे जिसने कई घर सुकूं के,

तरसता गया आशियाने की खातिर।।

मिरा दिल दबाया था पन्नों में उसने,

महक न रही भूल जाने की खातिर।।

जलाया दीया किसने नजदीक आकर,

रकीबों को रस्ता दिखाने की खातिर।।

कुछ भी नहीं शेष ख्वाहिश बची अब,

मेरे यार तुमको बताने की खातिर।।

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रचनाकार

Author

  • शेषमणि शर्मा 'शेष'

    पिता का नाम- श्री रामनाथ शर्मा, निवास- प्रयागराज, उत्तर प्रदेश। व्यवसाय- शिक्षक, बेसिक शिक्षा परिषद मीरजापुर उत्तर प्रदेश, लेखन विधा- हिन्दी कविता, गज़ल। लोकगीत गायन आकाशवाणी प्रयागराज उत्तर प्रदेश। Copyright@शेषमणि शर्मा 'शेष'/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |

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