कभी देखा है?

कभी देखा है?
दबे कुचले मैंले लोगों को
उनके होठों के हिलते कंपन को
उनके मन की लहर को
आंखों के सूखे आंसू को
हृदय की करुण पुकार को
हृदय में उठते दुख के ज्वार भाटे को
कहने से पहले रूकती वाणी को
कभी महसूस किया आपने
क्या कभी अपने को मानव होने का बोध कराया
दिल से छलकती दर्द भरी कहानी को
खिलने से पहले मुरझाई कली को
रूदन करते बोझल मन को
बे उम्र ढलती चेहरे की झुर्रियों को
बेजुबान सी दबी हुई मन की भावना को
आते जाते लोगों को देखते हुए उनकी उमडती भावना को
छांव पाने की चाह में लटकते झुरमुट से बाल को
तपती रेत पर नंगे पैर चलने की आदत या मजबूरी को
कितने हिस्से में टूटा होगा उनके सुख का संसार
कभी सोचा
कितने हिस्से का जुड़ा हुआ उनके दुख का पहाड़
किसी ने उनके सुख-दुख को साझा किया
क्या चाह नहीं उनको
आप जैसे बनने की
अभावों से दूर हो रहने की
स्वयं को साज करने की
अच्छा जीवन जीने की
बच्चों के पालन करने की
किसी ने उनको मानव होने का बोध कराया या स्वयं को
सब जानकर अनजान बनते हैं
पत्थर से इंसान बनते हैं
भावुक हृदय कठोर हो गया
मन में लालच भरी संवेदना मर गई
स्वार्थ में डूबा संसार फिर भी बेचैन है सद्भाव
क्या आज किसी में परोपकार है
संवेदना है सुख-दुख समझने की क्षमता है
अपनी सारी इच्छाएं पूर्ण हो
आलीशान बंगला एसी नई कार
तमाम तमाम सुख सुविधा की चीजें
उनकी सिर्फ और सिर्फ
सूखी रोटी से बढ़कर कुछ स्वादिष्ट भोजन तक

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रचनाकार

Author

  • गिरिराज पांडे

    गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |

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