इस सफ़र में

ज़िन्दगी के इस सफ़र में

धूप भी है- छाँह भी ।

कंटकों की सेज सोना

ख़्वाब फूलों के संजोना

मुस्कुराना आँसुओं में

हर्ष में पलकें भिंगोना

इस कदम पर ‘वाह’ है तो

उस कदम पर ‘आह’ भी ।

गा रहे झरने कहीं पर

कहीं मरुथल की तपन है

थकन है ,गति की तृषा भी

लगी मंज़िल की लगन है

लुभाते बन्धन सुनहले

मुक्ति की है चाह भी ।

कभी पतझड़ की उदासी

कभी वासन्ती नज़ारे

कभी जलता जेठ सिर पर

कभी सावन की फुहारें

चल रहे हैं इस डगर पर

भिखारी भी – शाह भी ।

Facebook
WhatsApp
Twitter
LinkedIn
Pinterest

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

रचनाकार

Author

  • डॉ रवीन्द्र उपाध्याय

    प्राचार्य (से.नि.),हिन्दी विभाग,बी.आर.ए.बिहार विश्वविद्यालय,मुजफ्फरपुर copyright@डॉ रवीन्द्र उपाध्याय इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है| इन रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है|

Total View
error: Content is protected !!