अब तो यह याद भी नहीं आता

समाज अब

समाज नहीं

रह गया है

यह तो सजावट का

एक बाजार बन गया है

चारों ओर चकाचौंध का

हथियार बन गया है

रंगबिरंगे बोर्ड पर अब

अपना अहसास टंग गया है

खोजते फिरते हैं हम

अपनी पहचान खो गया है

अब तो अकेलों की भीड़ में

इंसानियत ही खो गई है

बोर्ड की भाषा ही लुभा रही है

इंसान तो बिकने वाली

बाजार की चीज बन गया है

इसकी भाषा बदल रही है

इसकी परिभाषा बदल रही है

इसके मन की संवेदनाओं का

संदेश बदल गया है

बिकते इंसानों का

मोलभाव हो रहा है

मन की बात भी

अब घात बन गई है

विश्वास खो गया है

ढूंढते ढूंढते क्या खोज रहा था

अब तो यह याद भी नहीं आता !

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रचनाकार

Author

  • रामेश्वर प्रसाद चौधरी

    Copyright@रामेश्वर प्रसाद चौधरी/इनकी रचनाओं का ज्ञानविविधा पर संकलन साहित्यिक/शैक्षिक उद्देश्य से किया गया है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |

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