जो देखा एक गुलाब तो दिल ये मचल गया
कांटा नहीं था फिर भी वो सीने मे चुभ गया
कहते हैं लोग पंखुड़ी कोमल गुलाब की
पर छुआ उसको जैसे ही खंजर सा चुभ गया
खुश्बू ने उसकी दिल में घोली मिश्री इस तरह
इतनी मिली मिठास की ओ शुगर दे गया
कितनी थी मीठी खुशबू उसकी क्या बताऊं मैं
निगाहों से उसने दिल में मेरे नशा भर गया
उसके लिए ही मैंने सजाई थी महफिले
वह दिल का हार बनके मुझको फिर हरा गया
मै सूर्य जैसा वह तो चंद्र के समान थी
पर कल्पना में सूर्य को पसीना आ गया
पा जाऊं उसको मैं निशाना साधता रहा
वो उलट करके मुझको निशाना बना गया
सपने सुनहरे आंख में सजते ही रह गए
वो गैर को ही अपना ठिकाना बना गया
करती रही भ्रमण वो दिल के बगीचे में
पर उसकी खुशबू को तो कोई और ले गया
खुशबू जो उसके रूप की पहले दिनों की थी
जीवन में भूल पाऊं ना ओ एहसास दे गया
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


