हे अभावों से जन्मी चपल बालिके
अब मेरे घर ना आना तू फिर से कभी
मेरे जीवन में खुशियां ही छाई रहे
ना शिकन मेरे मस्तक पे लाना कभी
सुख की निद्रा में ही मुझको सोने दे अब
देके ठोकर ना फिर से जगाना कभी
मैं गमों में ना हरदम यहां पर रहू
आके इतना न मुझको सताना कभी
मैं तेरी मान लूं तू मेरी मान ले
मेल इतना तो मुझसे बिठाना कभी
हो सके मेरे जीवन में दुख ना कभी
ऐसा रिश्ता तू मुझसे निभाना कभी
कैसे सीखूं तेरे बीच रहना यहा
आ के फिर से तू मुझको बता ना कभी
सबके जीवन में एक बार आती है तू
झुर्रियां माथ सबके दिखाती है तू
कौन अपना यहां और पराया है कौन
ज्ञान दोनों का आकर कराना कभी
कैसे चिन्ता मे रहकरके जीते हैं सब
हाल सब का मुझे भी बताना कभी
जो अभावो में डूबी ना हो चांदनी
सबके जीवन के घर में बिछाना कभी
रचनाकार
Author

गिरिराज पांडे पुत्र श्री केशव दत्त पांडे एवं स्वर्गीय श्रीमती निर्मला पांडे ग्राम वीर मऊ पोस्ट पाइक नगर जिला प्रतापगढ़ जन्म तिथि 31 मई 1977 योग्यता परास्नातक हिंदी साहित्य एमडीपीजी कॉलेज प्रतापगढ़ प्राथमिक शिक्षा गांव के ही कालूराम इंटर कॉलेज शीतला गंज से ग्रहण की परास्नातक करने के बाद गांव में ही पिता जी की सेवा करते हुए पत्नी अनुपमा पुत्री सौम्या पुत्र सास्वत के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन करते हुए व्यवसाय कर रहे हैं Copyright@गिरिराज पांडे/ इनकी रचनाओं की ज्ञानविविधा पर संकलन की अनुमति है | इनकी रचनाओं के अन्यत्र उपयोग से पूर्व इनकी अनुमति आवश्यक है |


