पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

।। रिश्ते।।

दामिनी दमकी गगन में फिर निराशा छा गयी वो पास कैसे आ गयी।। टिकते नहीं रिश्ते पुराने, जग में ऐसा वाद है जनक सुत संग

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।। पानी – पानी।।

चहुंओर दिख रहा पानी – पानी कीचड़ से गीली चूनर धानी। बच्चे कागज की नौका दौड़ाये हाल नदी की वही पुरानी।। खतरों से वह खेल

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देश के रहनुमाओं से मेरे इन सवालों के ज़बाब चाहिए

ये नफऱत,ये दहशत ये दिलों की दूरीकब मिटेगी ?? ये शिक़वे, शिक़ायत व बदले की आगकब बुझेगी ?? ये लालच,चोरी व दौलत की भूखकब मरेगी

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गज़ल-बेपर हुए

पंख रहते हुए भी बेपर हुएपरिन्दे जो क़फ़स के अन्दर हुए ! पत्थरों को बना डाला देवतापुजारी जैसे स्वयं पत्थर हुए ! कह रहा था

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रिश्तों की बात हो।

जिस्मों के भीड़ में अब रिश्तों की बात हो, हैवानियत से मिलचुके अब  फरिश्तों की बात हो। मुहब्बते सरजमीं से कर   लाखों ही  मर-मिटे, अब

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उंगलियाँ

लम्बी, छोटी नाजुक उंगलियाँ समवेत गोलबन्द होती हैं हथेली पर जब -मुट्ठी बन जाती है उनकी नजाकत अचानक हो जाती है मुट्ठी की ताकत हथेली

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