फिसलता रहा(गज़ल)
तेरे आगोश में ज़िस्म जलता रहा मौत की राह पर मै तो चलता रहा तेरे यौवन की आतिश को छू छू के मैं मोम जैसा
तेरे आगोश में ज़िस्म जलता रहा मौत की राह पर मै तो चलता रहा तेरे यौवन की आतिश को छू छू के मैं मोम जैसा
जिंदगी को मत गुजार रोने में कुछ फायदा नहीं है चैन खोने में भूल जायेंगे तुझे सब ही एक दिन बैठ गया तू जो छिप

यूँ साजिशों की उठती नज़र देखता रहा कितना सहेगा मेरा जिगर देखता रहा जिनकी जफाओं से यहाँ कितने ही दिल दुखे उल्फत का ताज उनके
गुबारे दिल न जाने कब से है रोका हुआ साहिब तुम्हें पहचानने में है मुझे धोखा हुआ साहिब हुये थे जब मुहब्बत में ये इक
आने जाने का सिलसिला रखता भ्रम मुहब्बत का तू बना रखता गुम न होता जो यार तू इकदम दिल ये थोड़ा तो आसरा रखता दूर
एक तमन्ना मर गई , होते होते शाम । तड़प तड़प कर आ गया , इस दिल को आराम । चटकी कली गुलाब की ,
जी नहीं लगता कहीं पर क्या करें । सोचते रहते हैं दिन भर क्या करें । हैं सभी दुश्मन हमारी जान के । है यही
इस क़दर टूटे मरासिम वक़्त तनहा रह गया । मुस्कराहट जा चुकी है ज़ख़्म गहरा रह गया । यूँ तेरी तस्वीर रक्खी है ज़हन में
मुस्कुराने से भला क्या दर्द कम हो जाएगा । देखना इन कहकहों का शोर नम हो जाएगा । मौत से डरते हैं हम तो इक
बचपन न रहा है,न जवानी रहेगी, सदा अपनी हसीं ये, कहानी न रहेगी । सब छूट जायेगा, यहीं का यहीं पर, तेरे वजूद की कोई,