
तू गा तो सही मुस्का तो सही
सुबह के पन्नों पर पायीशाम की ही दास्ताँएक पल की उम्र लेकरजब मिला था कारवाँवक्त तो फिर चल दियाएक नई बहार कोबीता मौसम ढल गयाऔर

सुबह के पन्नों पर पायीशाम की ही दास्ताँएक पल की उम्र लेकरजब मिला था कारवाँवक्त तो फिर चल दियाएक नई बहार कोबीता मौसम ढल गयाऔर

शब्द से चेतना तक फैले हुए हैंहर तरफ नयन ही नयननयनो की अपनी लिपिअपनी भाषा अपनी विधाअपनी सूक्तियांअपने दोहे अपनी चौपाइयांनयनो के अपने सरोवरअपने सागर

परेशान आदमीशायद जानता ही नहींजहाँ राह खत्म होती हैवहीं शुरू होती हैनई मार्ग रेखाएंबस दो कदम और चलतातो तसव्वर से ज्यादा मिलने वाला थाअसबाब हो

मनुष्य अभीप्साओं का पिंड ही तो हैजीवनभर चला करता हैतमन्नाओं का सिलसिला ।एक के पास दूसरी इच्छा।अंतहीन सफर।तुष्टि अनवरत खोज ।एक बसेरा निकेत बन जाएतो

किसी की निगाह में खटकता था मैं जब उनके पनाह में रहता था मैं वो राह में छोड़कर चल दिये जिसको अपना कहता था मैं

मुझे किसी बात का न गुरूर हो पाये दयाल तेरे नाम का बस शुरू हो जाये न दुनिया की चाह है न चाहत है अमीरी

धर्मराज के दरबार में जब तेरा हिसाब होगा तेरे गुनाहो का वहाँ किताब होगा अगर हाथ तुने पकड़ा न समर्थ गुरू का काल के देश

ये परिंदे सफर में हैं उड़ रहे ऊँची उड़ान इनमें कौन हिन्दु है बताओ कौन है रहमान बहे बयार प्रेम का न हो मिट्टी लहुलुहान

भाई मुझे भुल न जाना याद रखना पापा की थी परी बस याद रखना बचपन मेरा गुजरा कुछ यादे जुडे है कुछ खट्टे कुछ मीठे

चार पैसा कमाने शहर जो गया गांव मुझसे मेरा बे नजर हो गया बीता बचपन जवानी गई बारिश की बुंदे सुहानी गई आई न लोट