पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

कविता

तू गा तो सही मुस्का तो सही

सुबह के पन्नों पर पायीशाम की ही दास्ताँएक पल की उम्र लेकरजब मिला था कारवाँवक्त तो फिर चल दियाएक नई बहार कोबीता मौसम ढल गयाऔर

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कविता

साँची आंखें

शब्द से चेतना तक फैले हुए हैंहर तरफ नयन ही नयननयनो की अपनी लिपिअपनी भाषा अपनी विधाअपनी सूक्तियांअपने दोहे अपनी चौपाइयांनयनो के अपने सरोवरअपने सागर

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कविता

परेशान आदमी

परेशान आदमीशायद जानता ही नहींजहाँ राह खत्म होती हैवहीं शुरू होती हैनई मार्ग रेखाएंबस दो कदम और चलतातो तसव्वर से ज्यादा मिलने वाला थाअसबाब हो

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कविता

अंधेरा अंदर नहीं बाहर है

मनुष्य अभीप्साओं का पिंड ही तो हैजीवनभर चला करता हैतमन्नाओं का सिलसिला ।एक के पास दूसरी इच्छा।अंतहीन सफर।तुष्टि अनवरत खोज ।एक बसेरा निकेत बन जाएतो

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