
कली खिलना चाहती है
कली खिलना चाहती है, फूल बनना चाहती है। कर दो पूर्ण स्वतंत्र उसको, अब वो बढना चाहती है। समाज रहा है उस पर अवसित, जाने

कली खिलना चाहती है, फूल बनना चाहती है। कर दो पूर्ण स्वतंत्र उसको, अब वो बढना चाहती है। समाज रहा है उस पर अवसित, जाने

प्रेम भक्त की आराधना है, साधक की साधना है। प्रेम मिलन की आस है, उन पर विश्वास है। प्रेम जीवन का आधार है, नाव की

कुछ इस कदर छाया है आँचल आपका मुझपर जिधर देखता हूँ आलम्ब आपका पाता हूँ। राहें जिन्दगानी में तुफानों से भरी जवानी में, जब कभी

सूर्य, चन्द्र और सितारें जिनके मुख मण्डल को आलोकित किया करते हैं। जिन्हें सत्कर्म करने को उनके सात्विक विचार आन्दोलित किया करते हैं। जिनके आँचल

देखकर चेहरा ये तेरा, कहता है अब मन ये मेरा तु क्यों है परेशान। फूल आशा के जो हैं खिलते, यूँ ही नहीं हमको हैं

मेरी प्रेमिका पुष्प की मुस्कान वो हैं। परिंदों के पैरों की उडान वो हैं। जिसको जीवन भर जीया मैंने , पाऊँगा जिसको अरमान वो है।

कोई आबाद करता है कोई बरबाद करता है। सदा हम भूलते उसको जो इसे आज़ाद करता है। खडा हूँ एक ऐसी ही बेगानों की मैं

आनंद ही आनंद मिलता है गोपाल तेरे चरणों में दुनियाँ को देखा मैंने ना तुझको मैंने पाया है ये दुनिया तेरी है प्यारे दुनिया में

बस एक ही तमन्ना दिल में प्यार मिले तेरे आँचल का कुछ यूँ छिप जाऊँ कि पता न चले तेरे आँचल का नशीली आँखे तेरी

गुलाब की कली के समान उत्पन्न होती है पुत्री और खिले फूल की भाँति महकती है पुत्री उपवन में सभी को आकर्षित करती है पुत्री