पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

कविता

हम हन दलित नारी

तुम सब जने अछूत कहत, हम हन दलित नारी।गरीबी विभेद अन्याय, भूंख प्यास से हम मारी।।तुमरे घर कोई जानवर मरे तो दलित मर्द उठाईस हय

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पद्य-रचनाएँ

श्री गुरु चालीसा

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वर:। गुरुर्साक्षात परमब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:॥ दोहा- हाथ जोड विनती करूँ, दो विद्या का दान। इससे ज्यादा क्या कहूँ, मेरे गुरुवर

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कविता

पृथ्वी- समुद्र प्रेम

हे धरणे! मैं तुमसे प्यार करता हूँ इतना। वह शब्दातीत है, वर्णनातीत है हमेशा से मेरी उठने वाली तरंगे लगती हैं जैसे प्रफुल्लित उमंगे उन्होंने

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कविता

 रिटायरमेंट

सेवा पुस्तिका में लिख दी गई एक ही दिन सेवा नियुक्ति के साथ लिखी  सेवा निवृति दोनों ही शब्दों में ’नि’ लगा है उपसर्ग लेकिन

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कविता

व्याकुल अखियाँ

व्याकुल अखियाँ तरस रही हैं दीदार तुम्हारा पाने को झर- झर होकर बरस रहीं हैं दरश तुम्हारा पाने को तैयारी मिलकर करो अब श्याम संग

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दोहा

दोहें

मेरे उनके प्रेम को, जाने नहीं हर कोय। समझेगा इस योग को, प्रेमी जिसका होय॥ मेरा उनका प्रेम क्या, अब चढता परवान। मैं सुख से

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कविता

मेरे पाँव की पायल

मेरे पाँव की पायल भारी होती चली गयी। मैं मंदिर से महफिल होती होती चली गयी॥ जाने कितने ब्याह रचाए, फिर भी रही अकेली, जिसने

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