
माँ अब मैं बडा हो गया हूं
माँ अब मैं बडा हो गया हूं सौन्दर्य भरा जीवन व्यतीत कर रहा एक बच्चा भवन का मालिक समझता खुद को जब मां लाती है

माँ अब मैं बडा हो गया हूं सौन्दर्य भरा जीवन व्यतीत कर रहा एक बच्चा भवन का मालिक समझता खुद को जब मां लाती है

देखो ‘ मैं नहीं मानता पत्थरों में बसे भगवान को सुना है तुम रोज जाती हो माथा टेकने मैं तो यही कहूंगा अगर वहां ईश्वर

अरे वाह! तुम तो बहुत समझदार हो गये चार किताबे क्या पढ ली छिपाने लगे अपने दर्द मुस्कुराना फैशन बना लिया पूछता हूं क्या हुआ

नहीं चाह मुझे तुम प्रेम की मिसाल बन जाओ न मर्यादा हो ऐसी कि सिया के राम बन जाओ न समझाने को प्रेम राधा के

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:। नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता:प्रणता:स्म ताम् ॥” हे माँ! तुम्हारे दर पे आए ज्ञान का वरदान दो।। कर दो सारे

जीवन चलता है निर्बाध अविरल गति से अपनी लय को लिए उम्र के एक पड़ाव पर आकर लगता हैं क्या किया हमने और आये क्या

मैंने देखा है.. तुम में स्वयं को तुम्हारी आंखों में स्वयं का विलय आंसुओ से सींचती अपने को कुछ तस्वीरे भी बया करती है मैंने

फुदकती छोटी सी मेरी चिड़िया आज न जाने कहाँ क्यो रूठी हैं मुझसे..? क्यो चुप हैं बोल आज तो..? सुबह सुबह दाना चुनती थी फुदक

मैं स्त्री पूरा जीवन किया समर्पित फिर क्यों न लटकी मेरे नाम की तख़्ती न माँ के घर पर न तथाकथित घर हम स्त्रियाँ घर

आगे बढिगा ढेरि जबाना अंगुरी आजी बाबक् छूट अम्मा बप्पक कहेम चलत हैं कहां बताओ बिटिया पूत अंगरेजी कै यहै पढाई परमपरा का लइगै लूट