
गर्व से बिहारी हैं
परीक्षा भी स्व इच्छा से देने वाले।डॉ राजेन्द्र प्रसाद के बिहार वाले।उन्हीं की ज़ुबान, में उनकी ही,बोलती बंद, कराते हैं,यूँ ही नहीँ हम, मैं तुम

परीक्षा भी स्व इच्छा से देने वाले।डॉ राजेन्द्र प्रसाद के बिहार वाले।उन्हीं की ज़ुबान, में उनकी ही,बोलती बंद, कराते हैं,यूँ ही नहीँ हम, मैं तुम

सता लो तुम चाहे जितना मैं तुमको न सताऊंगा ।कभी तो बैठोगे चुपचाप जब तुमको याद आऊंगा ।। कदर करता तुम्हारी हूं तब भी तुम

मैं बिखरता नहीं अगर समेट लेतेखुद के सपनों में धक्का लगाने के काबिल तो रहता। कदे प्यार मुझसे अगर तुम कर लेते,मरते दम तक तुम्हारे

बात कर लेने मात्र से ही तो मन मे दबी भावनाएं उखड़ने लगती हैं मन पर बढ़ा हुआ भाव हल्का हो जाता है मन में

निर्मोह बहती रही जीवन राग कहती रही आया जो पाया वही जग सुख-दुख का पुंज सही जाना है मंजिल सही मोह नहीं संदल सही ठहराव

यौवन की रुत आ गई , रहिए ज़रा सचेत । फूलेंगे मन प्राण में , अब सरसों के खेत । अभी आप आज़ाद हो ,

सुवासित शीतल सुखद बयार, भ्रमर मकरंद चखे स्वछन्द। लोग कहते हैं तुम्हें बसंत, प्रणय प्रण के अद्भुत आनंद।। सरसो के पीत हेम से पुष्प, कोयल

कंचन के कंगन की किकिंणि की खनकार, कर्णप्रय होत मन अति हरषात है। खेलत अहेर मार मारत है पंच सर, कलियन पर अलि देखि मन

नाचे दुनिया बावरी , समय बजाये बीन । बूढ़े घर में क़ैद हैं , बच्चे हुए मशीन । आंखें तेरी श्यामला , ज्यों काजल की

आपके स्नेह की शीतलता से मन मानो शांत था आपका आलिंगन छुवन तपिश खत्म करता था यादों की उष्णता से आज मन विचलित होता हैं