
बेटियां
देखो नित उड़ान अब,भरती है बेटियां, कहां किसी के रोके, रुकती है बेटियां । अब तो अम्बर भी छोटा, लगने लगा है, कुछ इस तरह

देखो नित उड़ान अब,भरती है बेटियां, कहां किसी के रोके, रुकती है बेटियां । अब तो अम्बर भी छोटा, लगने लगा है, कुछ इस तरह

कलम हमारी बोली कविवर, मुझे ये क्यूं नही बताते हो । एक वर्ष में तीन दिवस क्यूं ? तुम देशभक्ति जगाते हो ।। इस वतन

कतरा _कतरा रक्त बहाया, तन मन मातृ भूमि पर वार दिया । धन्य धन्य आजादी के दीवाने, ऐसे जन्मभूमि से प्यार किया ।। मंगल पांडे

आया बसंत झूम कर देखो, तरु नव पलल्व लगे है पाने । दिनकर को फिर तेज मिल गया, अब शीत को लगे है हराने ।।

बेजुबान है तो क्या कोई जज्बात नही है, मां के पेय पर शिशु का क्या अधिकार नहीं है। कौन सा मुंह दिखलोगे,दुनियां बनाने वाले को,

कभी भूमि फट रही है,कभी धरती हिल रही है देखो अब विनाश की,झांकी भी दिख रही है। भूस्खलन, तूफान,बाढ़ से,सब त्राहि माम कर रहे है,

जब हो बेला हमारी विदा की सखीकरके सिंगार मुझको सजाना सखीमेरे सजने में कोई कमी ना रहेऐसी सुंदर सी दुल्हन बनाना सखीदेख मुझको पिया भी

बम बम भोलेत्रिशूल धारी त्रिपुरान्तकारीदेह भस्म सारीमंथन किया सफलविष का पीया गरलसिर पर माँ गंगागले लिपटे भुजंगानटराज भोले बाबाअद्भुत अर्धनारीश्वर मेरे बाबाडमरू तांडव सजाएभांग घोट

अब हर पल लगने लगा हैन जाने क्यों कि कुछ पीछे छूट सा गया हैंक्या छूटा समझ से परे ही लगता हैंएक रिक्तता सी लगने

करती उद्बोधन प्रकृति मानोजगा रही मानव को चिरनिंद्रा सेदेखो कैसे नव उत्सर्जन फिर से भरता प्राणन हो सुसुप्त ए वृक्ष तू हो फिर तैयारसत्य यही