पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

कविता

चलता पागल पांव हमारा

अब भी पगडंडी राहों पर, चलता पागल पांव हमारा।बिते दिन की यादों को ले, खड़ा यह पीपल छांव पसारा।सन-सन करती चलती पूर्वा,संदेशा किसकी लाती है,बरसों

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कविता

जोगीरा

मेरे गुरु, भोले भंडारी, उनके गुरु गोसाई।बज्रिका मेरी वैशाली वाली, मिथिला वाली, सीतआमाईअब सुनो जोगीरा, भाई।जोगीरा स र र र र जोगीजी, जोगीजी वाह जोगीजी,राधा,

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कविता

नगर

हो उद्धार शहर का मेरे आप बनाए सवेरे अब तो कुछ प्रण करो शहर को मेरे स्वर्ग करो नालियों में है कूड़ा करकट मच्छर भी

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गज़ल

मानव

कुछ जानबूझ के कुछ अनजाने में किया करते हैं हम उनको कैसे कह दे अकेले ही जिया करते हैं फितरत है दुनिया की हर रोज

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गज़ल

सफर

खुशी-खुशी बीत जाए जिंदगी का सफर कौन यहां रहने आया जग में जो आया वही भरमाया कौन यहां रहने आया कल्पना क्या करें सभी सरताज

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कविता

भक्त

  स्वागत है वंदन तेरा  तू बना ले चंदन मेरा  दमका करूंगा मैं भी  तू अपना ले अभिनंदन मेरा    गंगा को मिला संग तेरा

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कविता

माँ का दर्द

पार जाके सात सेतू रहनुमा जो बन गए छोड़ अपनापन पराए गुलिस्ता के हो गए याद में उनकी सदा ही मा तड़पती रह गई लौट

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