
अलख जगाता रहता हूं
सा पंथ लिखा है मैंने वैसा जीवन जीता हूंप्रेम भाव में डूब के हरदम रस अमृत का पीता हूंसाथ कभी तो चल कर देखो कितनी

सा पंथ लिखा है मैंने वैसा जीवन जीता हूंप्रेम भाव में डूब के हरदम रस अमृत का पीता हूंसाथ कभी तो चल कर देखो कितनी

(पहले ) जख्म से जख्म दिल के मिटे जा रहे थेएक छूटे तो दूजे मिले जा रहे थेवो पुराना था अब तो नया मिल गयासोचकर

हर कदम से कदम अब मिला कर चलोफूल हर जख्म का अब मिटा कर चलोफिर तो मिल जाएगा तुझको सारा जहासब को अपने गले से

क्यों शर्मिंदा करते हो रोज़ हाल पूंछ कर,हाल वही है जो तुमने मेरा बना रखा है।। लिखना चाहता हूँ मैं भी कुछ गहरा सा, जिसे

अजनबी भी अपना हो सकता है अपनों में बेगाना खो सकता है दूरियों का माने मिलने वालों से पूछो फासलों से दिल का कोना रो

मैंने हंसकर के गुजारी है जिंदगी अपनीभले ही जिंदगी कांटों से होके गुजरी होसदा ही ठोकरो से सीखा संभलना मैंनेभले ही जिंदगी मे ठोकरे ही

देश के नौजवानों भुलाना नहींदेश की अस्मिता को मिटाना नहीतुम भले प्राण दे दो वतन के लिएदाग अपने वतन पर लगाना नही नाम तेरे वतन

दर्द होता है और दिल ये मचल जाता हैजब भी दिल को मेरे तेरा ख्याल आता हैउलझने छाती मन में आंख ये तारे गिनतेजबसे आंखों

मिल गई जिसको जमी आसमान पहुंचेगा फूल कैसा भी हो हर हाल में ओ महकेगामिल गया जिसको सितारा हमेशा चमकेगादिल की गहराइयों में डूब कर

एक महिला जिससेहर रिश्ता बुनियादी हैजो बचपन की गुरु हैऔर ममता की फरियादि हैमहिलाओं का सम्मानफ़र्ज है हमारायही सबक सबकेलिए मर्यादी हैदिलों पर पहलाअधिकार माँ