पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

कविता

स्त्री

जब तक स्त्री सुनती है, चुप रहती है,घर के सारे काम करती है,हाँ में हाँ मिलाती है, बिना सही गलत समझे,तब तक हि लोग उसे

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कविता

आत्महत्या ?

आत्महत्या कोई किस हालातों में करता है,कोई उस इंसान के दर्द को उतनी गहराई से,शायद हि समझ सकता। कोई एक कारण नहीं होता, नहीं हो

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कविता

क्या हो सकते हैं महान?

देश दुनिया में कभी संक्रमण तो,कभी आतंक का प्रहार हुआ।कई आपदाएं सर उठाकर कुचलने को तैयार हुआ।कभी चक्रवात(साइक्लोन), कभी भूकंप,कभी भूस्खलन तो कभी कुछ और।फिर

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गज़ल

तेरी नादानियाँ- गज़ल

मैं मेरी तन्हाइयाँ थीं और थीं ख़ामोशियाँ सिर्फ़ इतना ही बचा था तेरे मेरे दरमियाँ गर तुझे मालूम होतीं इश्क़ की गहराइयाँ तो समझता क्यूँ

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कविता

घरनी मुझसे रूठकर (कुण्डलिया)

घरनी मुझसे रूठकर, चली गई ससुराल। गया बुलाने एक दिन, आगे सुनिए हाल। आगे सुनिए हाल, सामने साली आई। अनुपम शिष्टाचार, साथ में लिए मिठाई।

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गज़ल

यूंँ ज़िंदगी में

यूंँ ज़िंदगी में गलतियांँ दोहराई नहीं जाती, यूंँ बात सभी की दिल से लगाई नहीं जाती। परिंदे हैं, उड़ने दो इन्हें उन्मुक्त गगन में ,

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कविता

खुशियाँ

सड़ चुके किचड़ में हीकमल के फूल निकलती है,ये खुशी का इजहार न कर,ये खुशियाँ तकलीफ से निकलती है। वो दिखते बहुत खुशहाल हैपर अंदर

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कविता

बसाकर दिल में उनको

दिलों में जिनके हूं अब तक दिलों में उनको रखूंगान निकलूंगा कभी दिल से निकलने उनको ना दूंगाचुराया दिल मेरा जिसने उसी का दिल चुराऊगासदा

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