इस यात्रा में
अँधेरे से आलोक की इस यात्रा में पार करना है एकाकी नदी,वन,पर्वत किसी राजर्षि की सनक पर सवार हो नहीं लेना मुझे स्वर्ग याद है
अँधेरे से आलोक की इस यात्रा में पार करना है एकाकी नदी,वन,पर्वत किसी राजर्षि की सनक पर सवार हो नहीं लेना मुझे स्वर्ग याद है
ताली बजा रहा है कोई कोई बैठ हाथ मलता है हर्ष-विषाद समन्वित जीवन ऐसे ही अबाध चलता है ! स्नेह-स्वांग सब हैं दिखलाते लाभ-लोभ के
बिक गये जो वस्तुओं की भाँति होकर चरण-चाकर रह गये जन के मन में,यश-गगन में आज हैं,कल भी रहेंगे आँधियों का वेग अपने वक्ष पर
माँगना न गीत अब गुलाब के ज़िंदगी की हर तरफ बबूल ! सुबह-शाम पेट का सवाल है बतिआयें प्यार, यार!किस तरह? पतझरी उदासी है रू-ब-रू
जब हवाओं में है आग की-सी लहर देखिए, खिल रहे किस क़दर गुलमोहर ! हौसले की बुलन्दी न कम हो कभी आदमी के लिए ही
देखा है उन्हें उदास मैंनेहताश नहींथकते देखा हैटूटते नहीं बाढ़ बहा ले जाती हैख़ून-पसीने से उगायी फसलझुलसा देता है सूखाहरिआयी रबी जबदेखा है उन्हें गंभीर,ग़मगीन
सच हुआ नहीं सपनासच क्या होगासपना है! चाहा करना सच स्वप्नयही क्या कम है ?आहत,मर्माहत हुआनहीं कुछ ग़म हैकुन्दन बनने के लिएसदा कंचन कोतपना है
क्रान्ति-वेला की ललित ललकार है तुलसी शारदा की बीन की झंकार है तुलसी । शील में देवापगा की लहर की मानिन्द शक्ति में गर्जित जलधि
बटोही जैसे जुगाता है गठरी चिड़िया अंडा जुगाती है जुगाये हमने बीज बोया-लगाया खेतों में कि लहलहायेगी फसल बालियाँ खनकेंगी खिलखिला उठेगा खलिहान फ़कत बीज
बुद्धि के दुर्गम किले में/ कैद भोली भावना है/ कंटकों की कचहरी में /फूल फरियादी बना है ! ज़िन्दगी का अर्थ — केवल अर्थ-संचय, त्याग