पद्य-रचनाएँ

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ख़ैरियत

राह चलते या कहीं बाज़ार में पूछता है ख़ैरियत जब कोई परिचित भर आता है मन सोचता हूँ , खोल कर रख दूँ सभी गोपन-

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कुसुम खिलाना है

गीतों में भर-भर कर /जीवन-राग सुनाना है जो सोया मुँह फेर समय से /उसे जगाना है। सत्पथ पर ही चलकर हमको/मंज़िल तक जाना है बेशक

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डर

बाहर कम अधिक- अधिक भीतर कायम है डर तिरती बर्फ जैसे जल पर घने अँधेरे में दीख जाती है औचक सामने कोई रस्सी सिहर जाता

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चाँदनी के लिए

तीरगी-तीरगी बढ़ रहे ये क़दम चार पल की मधुर चाँदनी के लिए । दरमियाँ दो दिलों के बहुत फासला छू रही है शिखर छल-कपट की

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फूल

नयनाभिराम/बहुवर्णी विविधगंधी/मनोहारी फूल मुरझा जाते हैं एक दिन धूमिल पड़ जाता है रंग सूख जाता है मकरन्द झड़ जाती हैं पंखुरियाँ ! फिर भी ,

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फिर भी लिखना है

किसको फ़ुर्सत पढ़े-सुनेगा ? फिर भी लिखना है,गाना है ! ख़ुदगर्जी की होड़ मची है मतलब के सब नाते हैं मन में कपट और कटुताएँ

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