पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

नवगीत

मजा है तबसे

प्रेम दिलों में जगा है जबसे दर्द दिलों का बढा है तबसेओ जब से समझा है प्यार मेरा मजा है जीने में और तब सेदिलों

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नवगीत

आओ हम सब दीप जलाएँ

घिरे हुए अंतर तन मन में ज्ञान प्रेम की ज्योति जलाएँरहे अंधेरा कहीं नहीं अब जग में उजियारा फैलाएँमैंले कुचले दबे हुए जो उनमें भी

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कविता

जिंदगी ख्वाब है

जिंदगी ख्वाब है इस ख्वाब में क्यों जीते होजिंदगी प्याला गरल का इसे क्यों पीते होजितना जीवन में मिला उसको ही पूरा समझोऔर पा जाऊं

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कविता

बात करते नहीं

आजकल आप क्यू बात करते नहींकितना मुझसे तेरा फासला हो गयागांठ दिल में तेरे ऐसी क्यू पड़ गईआज मैं भी पराया सा दिखने लगातूने मुझको

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कविता

अमावस (दीपावली )

आज अमावस रात अंधेरी उस पर दीप जलाएंगेकरके उजाला इस जग में हम दूर अधेरा भगाएंगेसब कुछ जगमग जगमग करके मन का भाव जगायेंगेरोशनी की

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कविता

दिल में उजाला होता

गर तेरा भाव मेरे भावो में डूबा होतामाधुरी रात बनके दिल में उजाला होताकभी ना देखता मैं आसमा के चंदा कोदिल में चेहरा तेरा गर

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कविता

हे जिंदगी

गुमसुम उदास सी बैठी क्यों तुम गीत कोई तो सुनाओ नाखिला के चारों ओर सुगंधित उपवन को महकाओ नाना हो जाए धुंधली ज्योति नैनो को

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कविता

शरद पूर्णिमा

आज पूर्णिमा के अवसर पर गंगा के स्नान सेपावन ये जीवन हो जाए तन मन भीगे भाव सेगंगा की लहरें जब उठती मन में हिलोरें

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कविता

नजर आते हैं

बीते लम्हों को कभी याद जो मैं करता हूंथकी आंखों में मेरे अश्क नजर आते हैंनहीं छुपा के रखता बात जो भी दिल में कभीखुली

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कविता

जिंदगी

जिंदगी है एक नदी जो हर दम ही बहती रहेजिंदगी एक शाम सी जो रोज ही ढलती रहेजिंदगी तो धूप सी जो रोज ही तपती

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