पद्य-रचनाएँ

Category: पद्य-रचनाएँ

कविता

स्त्री

स्त्री खड़ी सजी सँवरी सौम्य लगी,दिल मे उतरी तो वो उसका प्रेमी कहलाया फिर बढ़े आगे तो घर में वो राह निहारती मिली पत्नी कहलाई

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कविता

आज से बस मेरी हो

वजह रही हो चाहे जो भी मुझसे मिलने कीस्वार्थ में या की प्रेम में ही बात करने कीआंख के रास्ते से दिल में समाए बैठी

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कविता

सुहाने से मौसम में मैं घूमता हूं

जिंदगी के सफर में यूं ही घूमता हूंहवाओं के संग में ही मैं झूमता हूंवादियां जो प्रकृति की प्रफुल्लित खिली हैंउसी में ही जीवन का

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कविता

वसंत पंचमी

पतझड़ सा आगन था मेराआज खुशी की छाया हैआज सुनहरे से जीवन मेमौसम बसंत का आया हैखेतों में लहराए बालीपुष्पों की कलियां खिली हुईसूने सूने

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कविता

नमन उनको मैं करता हूं

दिलाई जिसने आजादी नमन उनको मैं करता हूंगवाएं प्राण थे जिसने नमन उनको मैं करता हूंनहीं देखा नहीं सोचा कि आगे हाल क्या होगासमर में

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कविता

हो कभी ना फासला

फासला ना हो कभी भी दिल से दिल के मेल काएहसास का हो फासला ना हो कभी उम्मीद काहम संभलते ही रहेंगे जिंदगी के मोड़

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कविता

फौजी की पत्नी अपने फौजी से कहती है

सुनोमेरे साथी मेरे हमगममै तुम्हे याद बहुत करती हूंतुम वहां दुश्मनों से लडते हैमै यहां तुम्हारी यादो से लडती हूंकुछ तो बताओ कब तक आओगेमेरे

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कविता

ज़िंदगी

कितना कुछ सिखाती हैं ज़िंदगी,कभी गिराती तो कभी उठाती है ज़िंदगी।संघर्षों से लड़ना सिखाती है ज़िंदगी, आम से खास बनाती है ज़िंदगी।कभी आशा कभी निराशा

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कविता

माँ शारदे वन्दना

तुम कला, स्वर की देवी हो माँ,तुम बिन यह जीव गूंगा है माँतुम बिन यह संसार,अज्ञानता से भरा है माँतुम ज्ञान की देवी हो,ज्ञान प्रदान

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