पद्य-रचनाएँ

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पद्य-रचनाएँ

माँ की जयकार(घनाक्षरी)

गांव गांव गली गली नगर चौराहे देखो,हर दिशा मां की जयकार ही सुनाई है।जिधर भी नजरें देखोगे उठाके उधर,मातु दुरगे की भव्य मूरति सजाई है।रखते

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कविता

गर्व से बिहारी हैं

परीक्षा भी स्व इच्छा से देने वाले।डॉ राजेन्द्र प्रसाद के बिहार वाले।उन्हीं की ज़ुबान, में उनकी ही,बोलती बंद, कराते हैं,यूँ ही नहीँ हम, मैं तुम

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कविता

मैं बिखरता नहीं

मैं बिखरता नहीं अगर समेट लेतेखुद के सपनों में धक्का लगाने के काबिल तो रहता। कदे प्यार मुझसे अगर तुम कर लेते,मरते दम तक तुम्हारे

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कविता

तब कहीं जाकर

बात कर लेने मात्र से ही तो मन मे दबी भावनाएं उखड़ने लगती हैं मन पर बढ़ा हुआ भाव हल्का हो जाता है मन में

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कविता

नदी

निर्मोह बहती रही जीवन राग कहती रही आया जो पाया वही जग सुख-दुख का पुंज सही जाना है मंजिल सही मोह नहीं संदल सही ठहराव

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कविता

सुवासित शीतल सुखद बयार

सुवासित शीतल सुखद बयार, भ्रमर मकरंद चखे स्वछन्द। लोग कहते हैं तुम्हें बसंत, प्रणय प्रण के अद्भुत आनंद।। सरसो के पीत हेम से पुष्प, कोयल

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कविता

कंचन के कंगन की किकिंणि की खनकार

कंचन के कंगन की किकिंणि की खनकार, कर्णप्रय होत मन अति हरषात है‌। खेलत अहेर मार मारत है पंच सर, कलियन पर अलि देखि मन

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