
फूल और कण्टक
फूल खिला है आँगन में कितना सुंदर लगता है! उडे खुशबू चहुँ ओर तब जब झोंका पवन का चलता है करे ईर्ष्या कण्टक उससे क्यों

फूल खिला है आँगन में कितना सुंदर लगता है! उडे खुशबू चहुँ ओर तब जब झोंका पवन का चलता है करे ईर्ष्या कण्टक उससे क्यों

जो चम- चम चमकता नित आठों याम है दुनिया वालों आज बता दूँ वही घनश्याम है सीना ताने जीयो प्यारे इस संसार में शोषण उसका

जीवन पर्यंत आवश्यक होती है आग भोजन न मिलने पर पेट में लगती है आग भोजन मिलने पर परहृदय में लगती है आग जीवन दायनी

नीर भरी दु:ख की बदली मैं, तरसूँ और बरसाऊँ। बिन तुम्हारे श्याम प्यारी, मैं खिन-खिन हो जाऊँ॥ वियोग तुम्हारा मुझसे अब तो, क्षण- भर सहा

जिसने मुझको ज्ञान देकर, ऋषियों का सम्मान दिया है। क्या है उचित और क्या अनुचित है, जिसने मुझको ज्ञान दिया है॥ जीवन की अलबेली राहें,

काँटों में उलझता हिन्दुस्तान देखता हूँ। घरों में होती दास्तान देखता हूँ॥ सैंतालिस में हुआ था तब बँटवारा इक बार, अब घरों में बनता पाकिस्तान

शब्द से चेतना तक फैले हुए हैं हर तरफ नयन ही नयन नयनो की अपनी लिपि अपनी भाषा अपनी विधा अपनी सूक्तियां अपने दोहे अपनी

मैं कहता हूं कि तुम भुला दो मुझे,कान्टेक्ट लिस्ट से हटा दो मुझे,ड्राइव से फोटो मिटा दो मेरी,गैलरी से पिक्चर हटा दो मेरी,सोशल साइट पर

रावण दुष्ट पापी नीच अथवा कुकर्मी था,उसकी वो सजा पाया,उसे भूल जाइए।आज की दशा को देखो,गली गांव नुक्कड़ में,उठेगी नजर यदि,रावण ही पाइए।होती है गलानि

ज्ञान दायिनी हे मातु,वीणा पाणि सरस्वती,दया दृष्टि थोड़ी सी तो,मुझपे दिखाइए।मैं अजान बालक हूं चरणों में मातु तेरेज्ञान चक्षु खोल मेरो मन हरसाइए।धवल वस्त्र धारिणी