केवल वंचना है!
रोक रोने पर,यहाँ हँसना मना है कहाँ जाएँ , वर्जना ही वर्जना है ! ठोकरों में दर-ब-दर है भावना आदमी के सिर चढ़ी है तर्कना
रोक रोने पर,यहाँ हँसना मना है कहाँ जाएँ , वर्जना ही वर्जना है ! ठोकरों में दर-ब-दर है भावना आदमी के सिर चढ़ी है तर्कना
मान बेच कर सुविधा पाना-तौबा-तौबा साहब के तलवे सहलाना- तौबा-तौबा ! मिहनत-मजदूरी का रूखा-सूखा अमृत हया गँवा कर हलवा खाना-तौबा-तौबा! गली-गली में, गाँव-शहर में,डगर-डगर में
फेंकते हैं वे मुट्ठीभर मूढ़ी धक्का-मुक्की करतीं देह पर देह लदीं उपलाती हैं-मछलियाँ प्रसन्न होते हैं पोखरपति उनकी अहेरी आँखों में प्रतिबिम्बित हो उठता है
ज़िन्दगी तो त्रासदी हुई उन्हें मधुर गीत चाहिए! आँखों पर पट्टियाँ पड़ीं कोल्हू के बैल बने हम वंचना के वृत्त में फँसे खींच रहे बोझ
झूमती फूलों भरी डाली लिखें हर शजर के लिए हरियाली लिखें । सूर्य-किरणों के लिए सादर नमन अमरबेलों के लिए गाली लिखें । रू-ब-रू है
भूख झेलना भूख पर भाषण बेलना दो विपरीत बातें हैं बरखुरदार ! चाहे जितनी बार ‘ आग ‘ कहिए जीभ को आँच तक नहीं आती
ज़िन्दगी के इस सफ़र में धूप भी है- छाँह भी । कंटकों की सेज सोना ख़्वाब फूलों के संजोना मुस्कुराना आँसुओं में हर्ष में पलकें
हमक़दम, हमदम न होगा हौसला पर कम न होगा । तमतमाये तमस जितना उजाला मद्धम न होगा । बालिए विश्वास – दीपक संशयों का तम
अहं जब होकर तरल है ढुलक जाता अश्रु बनकर याद आती है तुम्हारी ओ प्रिये! जब कभी लगता है घिरने दिन में ही आँखों के
दर्द की परछाइयाँ भीड़ में है आदमी पर ढो रहा तनहाइयाँ घेरती हैं ज़िन्दगी को दर्द की परछाइयाँ ! वायदे ,नारे सुनहरे कब निभाएँगे जनाब