कोहरा
पहन कर चोंगा/ सफेद रोंयेदार सूरज के खिलाफ / निकल पड़ा है अंधकार! कोहरे में गुम हो गयी हैं गलियाँ, राहें बन्द है बच्चों की
पहन कर चोंगा/ सफेद रोंयेदार सूरज के खिलाफ / निकल पड़ा है अंधकार! कोहरे में गुम हो गयी हैं गलियाँ, राहें बन्द है बच्चों की
पिछले हैं जख्म हरे ,दहशत का साया है विज्ञापन पर सवार नया साल आया है ! थिरक रहे साहब जी,हल्कू हलकान बहुत नगरों में नाच-गान,
तुम्हारी याद जैसे घने जंगल में भटके हुए प्यासे बटोही के कानों में बज उठे किसी निर्झर की आहट का जलतरंग! तुम्हारी याद, जैसे तंग
आक्षितिज पाँक्त हैं देवदार फुनगियों पर आसमान उठाये! पास की घाटी में गा रहा निर्झर अप्रतिहत ऊपर और ऊपर वातायनों में घुस रहे हैं दल
चमचम कटोरी में दूध-भात खाता है बाअदब पुकार कर जगाता है स्वामी को सुबह-सुबह पिंजड़े का सुगना फिर राम-नाम गाता है ! धोंसले की झंझट/
क्या चाहती है चिड़िया ? चोंच भर दाना/आज़ाद उड़ानें हरी -भरी डाल पर तिनकों का छोटा-सा आशियाना चाहती है चिड़िया सघन कुंज/ फूले-फले वाटिका-बाग बालियों
अधनंगे लोगों का वृत्त में जमाव ताप तनिक , धुआँ अधिक सुलगता अलाव । किस्सों – बुझौवलों से बने नहीं बात मालिक के सूद सरिस
तुम्हारे साथ आता है एक मौसम मेरे पास रंग-रूप-सुवास का मौसम तृप्ति-विश्वास का मौसम जीवन के गहरे स्वीकार-सत्कार का मौसम मौसम अछोर संवादों का मयूरपंखी
है समष्टि चेतना का नाम कुँवर सिंह आदमी की मुक्ति का पैगाम कुँवर सिंह पुत्र वही मातृ-क्षीर की रखे जो लाज मातृभूमि-भक्ति का परिणाम कुँवर
नये-नये उत्पाद /रंग-बिरंगे दूरदर्शनी सतरंगे परदे पर विज्ञापन-बाढ़ ! एक को ठेलती दूसरी लहर तीव्रतर भारी शोर है भीषण होड़ है ! एक दाँत चमका