कविता

Category: कविता

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संघर्ष

सिंह आदि मांसाहारी को, करना हैं पड़ता , संघर्ष अगर । तो प्राण रक्षा हेतु भागते, मृग आदि शाकाहारी डरकर।। मृग आदि शाकाहारी को ,

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सर्द रातें

होती हैं बहुत कष्टदायी यह सर्द रातें, विशेषत: उनके लिए जो घरों में रहना चाहते । मज़बूरी और भाग्य की ठोकर ना जानें वो बेचारे

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बढ़े चलो

मिलती है असफलता एक बार में, तो उससे भी कुछ सीखा होगा उस बार में उस अनुभव को न जानें दो बेकार में क्या कमी

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चक्रव्यूह

चक्रव्यूह के हर द्वार परमैं अकेला ही खड़ा था,महारथियों कीसमवेत सेना के सम्मुख,तलवारों की नोंक सेअपने को बचाता हुआअंधी सुरंगों के बीचउजास की रेखाएं ढूंढ

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मजहब

हम सब अपने अपने धर्म के तरफदार हैं मगर धर्म है कहाँ मंदिर में देखा तो मूर्तियां मिली घण्टी,घड़ियाल दीप धूप बत्ती मिली मगर धर्म

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अलाव

( उपन्यास सम्राट कलम के सिपाही प्रेमचंद जी द्वारा रचित पूस की रात कहानी के सारांश पर आधारित ) पूस की वो ठंडी रात ,

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शांत रुदन

शांत रुदन अन्सुअन भी साथी मेरे ——————————- अरे यह क्या!अचानक बंद हो गई कहाँ गए सब आँसू आँखों के ? सूख गए! आवाज़ें निःशब्द हो

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रंग इन्द्रधनुष

धरती का हरापन सदा से बुलाते रहे मुझेमैं उसके आँचल में दूब बनकर पसर गया ,नीला विस्तृत आकाश हुर्र बुलाता रहा मुझेमैं उसमें घुसकर नीलकंठ

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