कविता

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बतियाती हैंअक्सर तुम्हारी यादें

बतियाती हैं अक्सर तुम्हारी यादें,कहती हैं, फिर इश्क़ करना है मुझे ll सोचता हूँ डरता हूँ फिर तन्हाईयों सेकैसे अब खुद से लड़ना है मुझे

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कभी मिलो तुम

कभी मिलो तुम,जहाँ पर “मैं” न हो lहो सिर्फ “मय” आंखो की,जहाँ शेह और मात की चाह न हो l कभी मिलो, सिर्फ मेरे होने

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गुनगुनी धूप में

गुनगुनी धूप में बैठे रहो यूँ पास मेरे lजैसे बैठी रहती हैं तितलियाँ,पुष्प पर सब भूल कर lजैसे बैठी रहती हैं चिड़ियां ,तरुवरों को चूम

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तुम्हारी उम्र

तुम्हारी उम्र न,उम्र से ज्यादा सी दिखने लगी है lआँखों के नीचे के डार्क सर्कल्स,अब गहरा से गए हैं lपेट पर फैट, थोड़ा थोड़ाहाँ, बहुत

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पता है

पता है,तुमको खोजता हूँ मैं,कभीकोलंबस की तरह ,तो कभी कस्तूरी मृग की तरह l पर, तुम मिलती ही नहीं lहाँ, सच मानिए……….मिलती ही नहीं,कहीं भी,

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तारीखों पर टंगी यादें

तारीखों पर टंगी यादेंअचानक से,मैं और तुम के बीच कीरस्सी के दोनों मजबूत छोरों को छोड़मानस पटल पर गिरने लगती हैं l जैसे गिरने लगते

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तुम फिर दबे पाँव आना

तुम फिर दबे पाँव आना,कि मेरे अंदर का सन्नाटा,तुम्हारे आने का एहसास,महसूस ही न कर सके l सारे मौन अपनी अपनी जगह परयूँ ही व्यवस्थित

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सोचता हूँ दर्द को घड़ी बना दूं

सोचता हूँ दर्द को घड़ी बना दूं ,और मैं बाहर बैठा,देखता रहूँ,उसको, एक बिंदु के चारो तरफ घूमता हुआ l और देखता रहूँ,घंटा,मिनट और सेकंड

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मैं अक्सर खुद से लड़नें लगता हूँ

मैं अक्सर खुद से लड़नें लगता हूँ,टूटता हूँ,फिर अचानक से रोने लगता हूँ l बंद आँखों की पलकों के नीचे,दिल के सभी चारों चैंबरों के

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मर रहा होता है

आपके अंदर का मर्द मर रहा होता है ,जब कोई मनचला,किसी लड़की का रस्ता रोक,किसी लड़की को,दरंदगी का छूरा भोंक ,मुस्कुरा रहा होता है,और एक

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