कविता

Category: कविता

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हम हो चुके हो

जब तुम पढ़ने लगो,दो पंक्तियों के बीच के खालीपन को ,जब तुम समझने लगो,दो शब्दों के बीच के भारीपन को llजब तुमको सुनाई देने लगे

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नव वर्ष

क्या नव वर्ष कुछ बदलेगा?या सिर्फ तारीखें बदलेंगी,या माह करवटें लेंगें बस,या सिर्फ बधाई देंगें बस?क्या दुःख सुख की चादर ओढ़ेंगें?क्या कर्कश मधु की बातें

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कमजोर

कमजोर कौन है!स्त्री या पुरुष!दोनों!या फिर कोई नहीं! क्या कमज़ोर होना,देह या लिंग आधारित होता है !या कमजोर होना स्वभाव है !या कमजोर होना एक

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किसान दिवस

तुम लिख रहे हो, न उस किसान की महानता,जिसके खेत की फसल ,आप तक पहुंचते पहुंचतेजाति परिवर्तन कर लेती है ,अपना ईमान धर्म,सब बेंच देती

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तुमने फिर से बना लिए नए किरदार

तुमने फिर से बना लिए नए किरदार,मुझे, मेरी तन्हाई, मेरी बेवफाई को lतुम्हारी,कलम लिखते लिखते दौड़ने लगी,कागज़ पर कुछ नई कहानी सजोने लगी lतुम्हारे,जज़्बातों ने

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यादों के नाम ख़त

एक ख़त लिखना था,तुम्हारी यादों को lजो, भूल सी गयी,कई सालों से इस दिल का पता lऔर करके तन्हा,दे दी है इस दिल को सजा

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पिता के जूते

जब पैदा हुआ था,पिता केचमड़े के जूतों में थी चमक lउसके जिस्म से आती थी ,ऐशों आराम वाली महक lमाँ रानी सी रहती थीं,पिता राजा

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तुम, मैं और हम

तुम थे,मैं था ।थोड़ा थोड़ा सा अहम था l“तुम” में “तुम” भरपूर था,और मुझमें “मैं” l मैं ऋणात्मक सा था,एक छोटी सी लकीर ,वहम के

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